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ओलंपिक मैडल

इस बार ऐसा क्‍या हुआ है कि हर आम और खास को ओलंपिक मैडल चाहिए ही चाहिए, ऐसा क्‍या बदला है कि हम सोचने लगे हैं कि अमरीका, चाइना, ब्रिटेन और रशिया की तर्ज पर हम खेल के महंगे शौक को अपना सकते हैं और दुनिया में देश का डंका बजा सकते हैं ओलंपिक के जरिए।

पहले पीटी ऊषा से लेकर अभिनव बिंद्रा तक जब मैडल लेकर आए, तो अंधे के हाथ बटेर जैसी स्थितियां ही रही है, मिलने पर लोग भौचक रह जाते कि “यार ये ठीक तोप निकली, खैर भारत भाग्‍य विधाता” लेकिन नहीं, अब हमें तो गारंटी से मैडल चाहिए, यह समस्‍या क्‍यों पैदा हुई है ?? क्‍योंकि

राष्‍ट्रीय गौरव बढ़ा है

जिसका पहले नितांत अभाव था, केवल देश के गरियाने वाले बुद्धिजीवी और देश के लोगों से घृणा करने वाले पूज्‍य और देश के पैसे को चूस रहे लोग सरपरस्‍त थे, अब हर गली नुक्‍कड़ पर उम्‍मीद की किरणें बिखर गई हैं, तो मैडल के रूप में ओज भी चाहिए…

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दलितों की खबरें

पिछले चौबीस घंटे में दलितों से जुड़ी हुई 119 खबरें ऑनलाइन प्रकाशित हुई हैं। आज शनिवार है तो खबरों का दबाव आम दिनों की अपेक्षा कम है, दूसरी तरफ रियो ओलंपिक में मिले रजत पदक ने भी खबरों का मुंह मोड़ दिया है।

यह 119 खबरें तो मात्र गूगल न्‍यूज की हैं। जो खबरें गूगल न्‍यूज में लिस्‍ट नहीं होती हैं, उनकी संख्‍या मिलाकर पिछले चौबीस घंटे में 191 लेख दलित शब्‍द पर आधारित प्रचारित हुए हैं।

यह पता करना मुश्किल नहीं है, बस दलित लिखिए और गूगल पर सर्च कीजिए, फिर खोज डिवाइस में जाकर पिछले चौबीस घंटे पर उसे सेट कीजिए, तो आपके पास पिछले चौबीस घंटे में गूगल सर्च इंजन पर अपडेट हुए सभी लेख मिल जाएंगे…

हां, तो मूल बिंदू यह है कि आप सोशल मीडिया पर चाहे जैसी भड़ास निकाल लें, लेकिन एक पूरा तंत्र अंतरजाल को दलित शब्‍द से भरने में लगा हुआ है। अगर आज के आंकड़े को आधार भी बनाएं तो छह हजार लेख प्रतिमाह और पिछले दो साल में डेढ़ लाख लेख आए होंगे…

इतने तो कुल शब्‍द ही राष्‍ट्रवादियों ने नहीं लिखे होंगे। एक राष्‍ट्रवादी लिखता है, पांच उसकी पोस्‍ट को कॉपी कर फ्रेंड्स ओनली में शेयर कर लेते हैं।

अभी भी ऑनलाइन युद्ध असमान धरातलों पर लड़ा जा रहा है…

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खेल खिलाडि़यों के लिए…

किसी खिलाड़ी जैसी तो मेरी हैसियत है नहीं, लेकिन एक बार चार साल तक लगातार यूनिवर्सिटी स्‍तर पर बास्केटबॉल खेली है। हालांकि खेल मैंने केवल स्‍वास्‍थ्‍य के दृष्टिकोण से शुरू किया था, लेकिन एक बार घुसने के बाद बहुत जान लगाकर खेला, इसके बावजूद मेरी महत्‍वकांक्षा कभी राज्‍य, राष्‍ट्रीय या अंतरराष्‍ट्रीय खेलों में जाने की नहीं थी, लेकिन चूंकि अंदर था, तो रोज़ाना कॉलेज के समूहों से लेकर खेल संघों तक की राजनीति की सभी ख़बरें रहती थी।

आज ओलंपिक की पदक के करीब तीन लड़कियाँ पहुंची लेकिन एक भी लड़का नहीं, इसके पीछे सैकड़ों कारण हो सकते हैं, लेकिन मुझे जो कारण प्रमुख लगता है, वह है खेल संघों की राजनीति। खेल संघ अपने आप में छोटे छोटे ऐसे द्वीप हैं, जहां केवल उन्‍हीं की सरकार चलती है और खिलाड़ी उनके रहमोकरम पर ही अपना करियर बना सकते हैं।

लाखों में कोई एक खिलाड़ी ऐसा होता है, जो अपने प्रदर्शन के दम पर आगे आता है। बास्केटबॉल में कोर्ट पर पांच खिलाड़ी खेलते हैं, लेकिन टीम में कुल बारह खिलाड़ी होते हैं। हक़ीकत में हर टीम में केवल दो खिलाड़ी प्रदर्शन के आधार पर होते हैं, पांच में से तीन रहमो करम पर खेल रहे होते हैं और बाकी सात अधिकांशत: तफरीह के लिए टीम में जुड़े होते हैं। अब ऐसे दो दो खिलाडि़यों वाली टीम जिले से राज्‍य और राज्‍य से राष्‍ट्रीय स्‍तर पर पहुँचती है, इन टूटे फूटे खिलाडि़यों में से खेल संघों के पदाधिकारी अपनी पसंद, राजनीतिक दबाव और थोड़ा बहुत पैसा या फेवर लेकर टीम का चयन करते हैं।

कोई आश्‍चर्य नहीं कि ऐसी पूरी टीम में ही मीडियोकर खिलाड़ी जमा हो जाएं। ऐसा अधिकांशत: लड़कों की टीमों में ही अधिक होता है, लड़कियों का चूंकि प्रदर्शन कुछ खास नहीं होता, कहीं कहीं से लेकर जमा किया गया भानुमति का पिटारा होता है, ऐसे में जो लड़की कुछ अच्‍छा खेलती दिख जाए, उसे तरजीह देकर आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। ऐसी खिलाड़ियों की टीम को सामान्‍य तौर पर कोच भी वही मिलते हैं जिन्‍हें या तो नकारा माना जाता है या जिन्‍हें दण्डित किया जाता है। इस बीच कुछ क्षेपक ऐसे होते हैं, जो भारत भाग्‍य विधाता की तर्ज पर बेहतरीन महिला खिलाड़ी को बेहतरीन कोच मिल जाता है, तो पदक तक की दौड़ बहुत मुश्किल नहीं रहती। क्‍योंकि चयन से लेकर आगे बढ़ने तक ना तो राजनीति आड़े आती है, ना धर्म, ना समाज और रसूख का दबाव।

वास्‍तव में खेल के स्‍तर को सुधारना है तो

– देश में खेल संघों को पूरी तरह खत्‍म करना होगा, ये खिलाड़ियों से अधिक खुद के और करीबियों के पोषण के लिए है।

– खेल में प्रदर्शन को सीसीटीवी कैमरों से रिकॉर्ड किया जाए, ताकि बाद में किसी दूसरे खिलाड़ी द्वारा दावा पेश किए जाने पर वास्‍तविक प्रदर्शन जांचा जा सके।

– खेल से राजनीति को वैसे ही दूर रखा जाए, जैसे वैज्ञानिक संगठनों को दूर रखा गया है, शीर्ष स्‍तर पर पॉलिसी निर्माण के लिए जुड़े रहें, लेकिन क्रिया कलापों में उनका दखल अपराध घोषित किया जाए।

– राष्‍ट्रीय अथवा अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर केवल भागीदारी को नौकरी का आधार बनाने के बजाय पदकों को नौकरी का आधार बनाया जाए, एक बार पदक लाए खिलाड़ी को ऐसा शीर्ष दिखाया जाए कि बाकी खिलाड़ी केवल उसके कद और पद को देखकर ही तैयारी में जी जान लगा दें।

– सेना किसी भी सूरत में खेल के लिए नहीं है, कोई सैनिक खिलाड़ी बन सकता है, लेकिन सैनिक मेहनत कर सकते हैं, इस कारण खिलाड़ी बन सकते हैं, यह गलत धारणा है, खेल स्‍वच्‍छंदता की मांग करता है, जिसे त्‍यागने का सैनिकों को गहन प्रशिक्षण दिया जाता है।

– स्‍कूलों में खेल को अनिवार्य किया जाए और पीटीआई जैसे पदों पर पदोन्‍नति केवल स्‍कूली खिलाड़ियों के प्रदर्शन के आधार पर ही तय की जाए।

– ज़िला स्‍तरीय खेल अधिकारियों को खिलाडि़यों द्वारा प्रदर्शन नहीं किए जाने पर दण्डित किए जाने का प्रावधान होना चाहिए। या तो खिलाड़ी तैयार करें, अन्‍यथा स्‍थानान्‍तरण दूसरे स्‍थान पर जाएं या नौकरी त्‍यागें, सरकारी नौकरी केवल सीट तोड़ने के लिए नहीं मिली है।

– जो खेल मैदान जर्जर अवस्‍था में है, उन्‍हें बैंकों और कॉर्पोरेट घरानों को गोद दे दिया जाए, मैदान की हालत खराब होने पर कॉर्पोरेट की बैंक रैंक यानी साख गिराने और शास्ति के दण्‍ड प्रस्‍तावित किए जाएं। वर्तमान में हर कॉर्पोरेट समाज कार्यों में खर्च दिखा कर सरकार से अच्‍छी ख़ासी छूट लेते हैं, इन कंपनी कानूनों का सरकार के पक्ष में उपयोग होना चाहिए।

– जो गैर सरकारी संगठन खेलों के साथ जुड़े हैं, उनका रिकॉर्ड चैक किया जाए और संतोषजनक प्रदर्शन नहीं होने पर उन्‍हें खेलों से दूर किया जाए।

– ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर राजधानी तक खिलाडि़यों के लिए एक सुनवाई का चैनल हो, जो खिलाड़ी प्रदर्शन का दावा करे, उसकी पैनल बनाकर जांच की जाए और ट्रायल से तुरंत निर्णय किया जाए, खेल के मामलों में प्रदर्शन मौके पर ही होता है, इसके लिए सालों खर्च करने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी, खिलाड़ी का दावा सही होने पर उसे मौका मिलेगा और झूठा होने पर उसे निश्चित अवधि तक बैन किया जा सकता है।

– खिलाड़ी को पोषण के लिए पैसे देने के बजाय सरकार की ओर से ही न्‍यूट्रीशन सप्‍लीमेंट उपलब्‍ध कराए जाएं।