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डॉ. नारंग और उनके पड़ोसी..

अवतारवादी विकास अधिकांशत: पिरामिड की शक्‍ल में ही हो सकता है। समूह को गति देने वाले, समाज को आगे ले जाने वाले कुछ थोड़े से लोग होते हैं। ये निर्णय लेने वाले और संसाधनों का दोहन करने वाले लोग होते हैं। आमतौर पर सर्वाधिक अनुकूल स्‍थानों पर ये लोग बसते हैं और अपने कामगारों को वहीं बसाते हैं।
इसका परिणाम वर्तमान दौर में महानगरों के रूप में उभरकर आ रहा है। हर महानगर लगातार बड़ा होता जा रहा है। बजाय कि संसाधनों और शक्ति का विकेन्‍द्रीकरण करने के लिए पिछले साठ साल में हमने लगातार केन्‍द्रीकरण होते हुए देखा है।
दिल्‍ली, मुंबई, मद्रास, कोलकाता, जयपुर, चंडीगढ़, बैंगलोर और ऐसे ही कई और नगर जो महानगरों में बदलते गए, कामगार जुटते गए, एक पीढ़ी संघर्ष करते हुए बीत गई तो दूसरी पीढ़ी आ गई, फिर तीसरी पीढ़ी आ गई। जो बूढ़े हुए, अशक्‍त हुए वे या तो दरकिनार हो गए या स्‍वेच्‍छा से गांवों या छोटे शहरों में लौट गए।
ये महानगर अपने मूल क्षेत्र में सुरक्षित स्‍थान बनाए रखते हैं, जहां ताकतवरण और निर्णय लेने वाले ऐसे लोग रहते हैं, जो महानगर को चलाने का काम करते हैं, इस मुख्‍य स्‍थान के चारों ओर किसी मच्‍छी बाजार सा केओस बनता चला जाता है। एक सीमा से बाहर के लोग महानगरों की पैरीफरीज में घर बसाते हैं, अच्‍छे बुरे सभी लोग धनाढ्यों के बनाए सिस्‍टम में खुद को फिट करने का प्रयास करते हुए जीवन बिताने का प्रयास करते हैं।
इस पैरीफरी के बाहर कई गंदी बस्तियां होती हैं, जो इन नौकरीपेशा या स्‍वरोजगार से जीवनयापन कर रहे कामगारों के लिए हैल्पिंग हैंड का काम करते हैं। बहुत कम आय और बहुत घटिया जिंदगी के बीच ये लोग किसी प्रकार सर्वाइव करते रहते हैं। इन बस्तियों में संघर्ष की कहानियों के बीच समाजकंटकों की पनपना भी कोई टेढ़ी बात नहीं है।
इस प्रकार मैं महानगर के तीन स्‍पष्‍ट सर्किल देखता हूं। बहुत अधिक सुरक्षित जोन, उसके बाहर का असुरक्षित किंतु कुछ हद तक समृद्ध घेरा और उसके बाहर गंदी बस्तियां। यही है विकास का वर्तमान स्‍वरूप।
गंदी बस्तियों में सालों तक पल रहे समाजकंटक कब असुरक्षित बाहरी घेरे पर आक्रमण कर दे, कहा नहीं जा सकता। जब आक्रमण होता है, तो बाहरी घेरे में रह रहे लोग एक दूसरे की मदद करने का साहस नहीं कर पाते हैं, क्‍योंकि नौकरी अथवा स्‍वरोजगार में इतने अधिक फंसे हुए होते हैं कि आटे दाल के लिए सुबह सात आठ बजे से रात नौ दस बजे तक दौड़ते रहते हैं। बाकी समय मनोरंजन के छद्म साधन मसलन टीवी और इंटरनेट खा जाते हैं। ऐसे में सामाजिकता विकसित नहीं हो पाती।
आज डॉ. नारंग की मौत के बाद उनके पड़ोसियों को गरियाना लाजिमी है, लेकिन क्‍या किसी पड़ोसी के साथ यही दुर्घटना हो रही होती, तो क्‍या खुद डॉ. नारंग दिनभर क्लिनिक में खपा देने के बाद रात को बाहर निकलकर देख पाते कि कौन इस दुरावस्‍था के पैदा हुए समाजकंटकों के हाथों अपनी जान दे रहा है।
विकास का यह स्‍वरूप अमानवीय और निर्दयी है। वास्‍तव में विकास तभी हो सकता है, जब आत्‍मनिर्भर गांव और आत्‍मनिर्भर शहर हों, जहां अपना समाज हो, जहां अपना परिवार हो और विकास के लिए वहीं पर सुविधाएं और संसाधन मिलें।
वरना बाहरी असुरक्षित घेरे में संघर्ष कर रहे लोग इसी प्रकार समाजकंटकों के हाथों मरते रहेंगे। अपनी समस्‍याओं में उलझे उनके पड़ोसी कभी उनकी मदद के लिए नहीं आ पाएंगे।

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अर्जुन और कर्ण

आज सोच रहा था, उस दृश्‍य के बारे में जब कर्ण का रथ रणभूमि में धंसा हुआ था और अर्जुन अपना तीर कर्ण की ओर ताने हुए खड़ा था।

मृत्‍यंजय में शिवाजी सावंत लिखते हैं कि उन्‍हें मृत्‍युंजय लिखने का ख्‍याल ऐसी घटना से आया जब वे खुद एक नाटिका में अर्जुन का रोल कर रहे थे और कर्ण बने पात्र ने ऐसी आर्त्र पुकार की कि वे स्‍तंभित हो गए।

मुझे लगता है इस दृश्‍य में कुछ चूक है, कुछ गड़बड़ है। सूत के घर पैदा हुआ फौलाद का बना महायोद्धा तब के सबसे बड़े राजवंश को चुनौती देता है। महाभारत के युद्ध के प्रमुख सूत्रों में से एक जब अपने रथ का पहिया कीचड़ में धंसा होने पर उसे निकालने के लिए नीचे उतरता है, उसी क्षण अर्जुन उस पर निशाना लगा रहा होता है।

बेरहम युद्ध में जहां अपने पराए का भेद खत्‍म हो जाता है, वहां एक सप्‍ताह से अधिक लंबे समय तक नरसंहार कर रहा योद्धा क्‍या आर्त्र पुकार कर सकता है, क्‍या युद्धनीति की दुहाई दे सकता है।

मैं सोचता हूं वह दृश्‍य कुछ ऐसा रहा होगा कि –

कीचड़ में धंसे रथ के पहिए को निकालते समय गर्दन घुमाकर कर्ण देखता है कि अर्जुन उस पर तीर ताने हुए है, कृष्‍ण अर्जुन को कुछ कह रहे हैं, क्षणों के अंतराल में कर्ण समझ जाता है, वह मुस्‍कुराता है, जवाब में कृष्‍ण और अर्जुन भी मुस्‍कुराते हैं, तीर निकलता है, युद्ध की थकान से क्‍लांत कर्ण के गले को चीरता एक तीर आर-पार हो जाता है।

उन कुछ क्षणों के अंतर में जहां कर्ण अपनी गति पा लेता है वहीं अर्जुन के लिए अगला कुछ समय विषाद का रहा होगा।

यांग को खत्‍म करने के साथ ही यिन अपनी उपादेयता भी खत्‍म कर चुका होगा। कर्ण का शरीर मिट्टी में मिला, लेकिन अर्जुन की अस्तित्‍व उसके साथ ही खो गया….

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मोदीजी आपकी कुर्सी

मैं मोदी समर्थक हूं, बड़ा वाला… मुझे मोदीजी के अब तक के सभी काम पसंद आए हैं। नीतियों को लेकर अब तक किसी को आलोचना का मौका नहीं मिला है, उनकी धोती, पजामा, कुर्ता, पैंट, चश्‍मा, बाल, खाल और चाम के बारे में बौद्धिक वर्ग को कुछ आभास हो पा रहा है, सो अधिकांश बौद्धिक बुद्धि बेचना छोड़ चमारी के काम में उतरने की सोच रहे हैं….

मोदीजी ने बुलेट ट्रेन की कही अच्‍छी कही
मेक इन इंडिया की कही अच्‍छी कही
जन धन योजना की कही अच्‍छी कही
गैस सब्सिडी छोड़ने की कही अच्‍छी कही
पैट्रोल के पैसे को देश के विकास में लगाया अच्‍छा किया
सुनारों पर लगाम के कोण से एक प्रतिशत टैक्‍स लगाया अच्‍छा किया

लेकिन मोदीजी अब आपकी कुर्सी खतरे में हैं..

आज सुबह मेरा पेट ढंग से साफ नहीं हुआ आपकी कुर्सी…
बाहर गली में गधा रेंक रहा है अब आपकी कुर्सी…
एक आदमी दीवार पर मूत रहा है, आपकी कुर्सी…
नत्‍थूराम की साइकल पंचर हो गई, आपकी कुर्सी…
बारिश से फसल खराब हुई, आपकी कुर्सी…
नवरात्र में एक तिथि का क्षय हो गया, आपकी कुर्सी…
भाजपाई अनर्गल भाषण दे रहे हैं (और ये नई बात है), आपकी कुर्सी…
फेसबुक धीमा चल रहा है, आपकी कुर्सी…
व्‍हाट्सअप ने इंक्रिप्‍टेड मैसेज शुरू किए हैं, अब तो आपकी कुर्सी…
नववर्ष के लिए मंगवाई सभी ध्‍वजा खत्‍म हो गई, अब आपकी कुर्सी…
सुलभ शौचालय में सफाई नहीं है, अब आपकी कुर्सी…
देश में सटोरिए क्रिकेट पर सट्टा खेल रहे हैं, अब आपकी कुर्सी…
मीडिया में पत्रकारों का शोषण हो रहा है, आपकी कुर्सी…

मोदीजी प्रधानमंत्री न हुए वामपंथी विचारकों के इंद्र हो गए, आदि से अंत तक हिलते रहने वाले सिंहासन पर बैठ गए…

अब क्‍या होगा… सुनार हड़ताल पर हैं और खातियों के पास पर्याप्‍त काम नहीं है, अब आपकी कुर्सी…