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सफाई का खर्च

वे साधू थे, सनातनी नहीं थे, कोई दूसरे थे, भ्रमण करते गाँव पहुंचे तो प्रसिद्धि पहले पहुंची।

सेठ सेवा में आया तो पूछा क्या हुआ मेरी व्यवस्था का, सेठ ने कहा यहाँ सारी गंवार और गन्दी है, शहर में व्यवस्था करवा दूंगा।

ज्ञान प्राप्त साधू ने मुस्कुराते हुए कहा गन्दी है तो 5 रुपये साबुन की टिकिया के ही तो खर्च होंगे।

ले आओ…

(सत्य घटना पर आधारित)

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मोदी बनाम भाजपा

दो साल पहले नरेन्‍द्र मोदी की सरकार बनी… कुछ लोग इसे एनडीए तो कुछ भाजपा की सरकार कहते हैं, इसी तथ्‍य को लेकर मोदी का विरोध किया जा रहा है। निजी तौर पर देखा जाए तो मुझे अब तक कोई भी तार्किक व्‍यक्ति प्रधानमंत्री का विरोध करता नजर नहीं आया है। इन दो सालों में अधिकांश कार्टूनबाजी या तो भाजपा वालों ने की है या फिर विपक्ष ने।

मोदी समर्थक कभी नहीं कहते कि वे भाजपा समर्थक हैं। कांग्रेस को चैलेंज करने के लिए खड़ी हुई हिदुत्‍ववादी पार्टी भाजपा के नेताओं को लगभग वही हथकंडे अपनाने पड़े जो कांग्रेस साठ साल से अपना रही है। कुल मिलाकर पार्टी स्‍तर पर देखा जाए तो दोनों पार्टियों में अधिक अंतर नहीं है।

बहुत से नेता तो कांग्रेस छोड़कर भी आए हुए हैं। ऐसे में भाजपा से अथवा एनडीए से किसी प्रकार की उम्‍मीद करना बेमानी होगा। हमें या कहें कम से कम मुझे मोदी समर्थक के तौर पर भाजपा या घटक दलों से किस प्रकार की उम्‍मीद नहीं है। वे पहले भी भ्रष्‍ट मानसिकता और भ्रष्‍ट आचार वाले रहे हैं, आगे भी रहेंगे।

अब मोदीजी को अगर प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुंचना है तो भाजपा का रास्‍ता ही अख्तियार करना होगा। अब सवाल यह है कि मोदीजी की इस पद पर बैठाने की जरूरत क्‍या है, जब दोनों पार्टियां एक ही स्‍टैंड पर खड़ी हैं…

इसका जवाब आपको किसी भी सरकारी कॉलेज में मिल जाएगा, वहां विद्यार्थियों की शिकायत होती है कि शिक्षक पढ़ाने नहीं आते और शिक्षकों की शिकायत होती है कि विद्यार्थी कक्षाओं तक ही नहीं पहुंचते। कुल मिलाकर कॉलेज में पढ़ाई के अलावा हर चीज का माहौल बना रहता है।

जब भी भ्रष्‍टाचार की बात आती है, दो तरह की धाराएं पेश कर दी जाती हैं। कुछ कहते हैं जनता ही भ्रष्‍ट है, सो ऐसे लोगों को चुनती है जो भ्रष्‍ट है, सो भ्रष्‍टाचार नीचे से होते हुए ऊपर जाता है। दूसरी धारा कहती है कि ऊपर की ओर कुछ भ्रष्‍ट लोग बैठे हैं जो जनता को भ्रष्‍ट होने के लिए मजबूर करते हैं।

इस अंडे और मुर्गी वाले खेल का कहीं तो अंत होना ही चाहिए। ऐसे में मोदीजी की जरूरत है। वही प्रशासनिक ढांचा है, जिसके बारे में कहा जाता था कि यह अपने बाप की भी नहीं सुनता, यहां तक कि कुछ चुने हुए प्रतिनिधि भी रोते हुए दिखाई देते थे कि सरकारी अधिकारी उसके कहने में नहीं हैं। आज स्थिति यह है कि आम आदमी भी ठीक प्रकार अपनी शिकायत पहुंचाए तो सरकारी अधिकारी सेवक की तरह दौड़ पड़ते हैं।

अंडे मुर्गी का खेल खत्‍म हो रहा है, ऊपर से भ्रष्‍टाचार को गिरफ्त में लेने की कार्रवाई शुरू हुई है। अब देखते हैं अंडा बचता है या मुर्गी। जब ऊपर से भ्रष्‍टाचार की अनुमति नहीं होगी और डंडा पूरी ताकत से पड़ेगा तो नीचे वालों के लिए भ्रष्‍टाचार का स्‍थान नहीं बचेगा।

ऐसा नहीं है कि सबकुछ सुधर चुका है, सुधार आ रहा है, धीरे धीरे आ रहा है, इसका असर दिखने लगा है। जो चीज सालों में सड़ी है, उससे बनाने में वक्‍त तो लगेगा ही… राजतंत्र के बाद हम छद्म राजतंत्र की चपेट में आ गए, पहली बार लोकतंत्र आ रहा है… इसे समझने और काम में लेने की तमीज आने में भी वक्‍त तो लगेगा ही…

मोदीजी आप आगे बढ़ें, हम आपके साथ हैं

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बाइनरी अंकों को चुनौती

बाइनरी अंकों को स्वामी श्री निश्चलानंदजी की चुनौती

कंप्यूटर बाइनरी अंकों पर शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती ने सवाल उठाए हैं। सनातन धर्म के पथ प्रदर्शक माने जाने वाले शंकराचार्य ने ‘द्वैंक पद्धति (Binary System)’ नामक शोध पुस्तक में इसे सिद्ध भी किया है।

पुस्तक में कहा गया है कि बाइनरी अंकों में एक सीमा के बाद तारतम्यता भंग हो जाती है। स्वामी श्री निश्चलानंद जी अब तक गणित की 10 पुस्तकें लिख चुके हैं। इनमें अंक पद्म या सूत्र गणित, स्वस्तिक गणित, गणित दर्शन, शून्येक सिद्धि, द्वैंक पद्धति आदि शामिल हैं। इन पुस्तकों पर ऑक्सफोर्ड से लेकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों में तक शोध हो रहे हैं।

स्वामी श्री निश्चलानंद सरस्वती जी जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य हैं।

शंकराचार्य के अनुसार ‘शुक्ल यजुर्वेद’ के तहत आने वाला ‘रुद्राष्टाध्यायी’ इसका बेहतरीन उदाहरण है। इसमें श्लोक आते हैं ‘एका च मे, पंच च मे, सप्त च मे’ आदि। यह तथा ऐसी अनगिनत ऋचाएं यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि वेदकाल के भारतीय ऋषि न सिर्फ अंकों से परिचित थे वरन गणित में आज प्रचलित विभिन्न क्रियाएं जिसमें जोड़, घटाना, गुणा, भाग से लेकर बीजगणित, रेखागणित, त्रिकोणमिति आदि शामिल हैं, से भी परिचित थे।

90 वर्षों से चल रहा गणित पर अनुसंधान गोवर्धन पीठ के शंकराचार्य स्वामी श्रीभारतीकृष्ण तीर्थ जी ने वेदों की ऋचाओं में गणित के सूत्र खोज निकाले थे और वैदिक गणित के नाम से दुनिया को परिचित कराया था। बिना कैलकुलेटर या कंप्यूटर बड़ी से बड़ी और जटिल गणना सरलता से करने की इस पद्धति की आज दुनिया कायल है।

मूलतः बिहार के हरीपुर बख्शी टोला निवासी स्वामी श्रीनिश्चलानंद 10वीं तक पढ़ने के बाद वेदांगों के अध्ययन के लिए काशी आ गए थे। स्वामी श्री निरंजन देव तीर्थ जी के बाद 1992 में पुरी पीठ के शंकराचार्य बनाए गए। इसके साथ ही गणित के दार्शनिक पक्ष पर उनका चिंतन शुरू हुआ। 2006 में ‘अंक पद्म’ नामक पुस्तक के रूप में यह चिंतन सामने आया।