धारणा · sidharth joshi

सिस्‍टम

कुछ लोग न्‍यायपालिका और न्‍यायाधीशों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। उन सभी को हमारी संसद और संविधान पर भरोसा है। होना भी चाहिए, किसी भी संप्रभु राष्‍ट्र के नागरिकों को अपने चुने हुए नायकों पर भरोसा होना ही चाहिए। लेकिन मैं कुछ गणना पेश करना चाह रहा था।

किसी एमपी के चुनाव के लिए एक चयनित व्‍यक्ति होता है जिसे पार्टी से टिकट मिलता है। उस चुनाव का खर्च इन आउट मिलाकर दस से बीस करोड़ में निपट जाता है।

540 में से 300 चयनित प्रतिनिधि मिलकर पूर्ण बहुमत की सरकार बना लेते हैं। इस हिसाब से छह हजार करोड़ का कुल चुनावी खर्च प्रतिनिधियों के कुल चुनाव का होगा।

व्‍यापारियों का एक छोटा समूह इस रकम का प्रबंध कर सकता है। तो क्‍या आठ दस व्‍यापारी मिलकर एक देश चला सकते हैं, कानून बना सकते हैं, संविधान में संशोधन कर सकते हैं।

अगर सारी बात केवल पैसे से शुरू होकर पैसे पर ही खत्‍म होने वाली हो तो यकीन मानिए हमारा पूरा देश दस लोगों के इशारे पर चल रहा है।

और अगर नैतिकता का तकाजा बचा हुआ है, तो न्‍याय प्रणाली से विश्‍वास उठाने का अभी समय नहीं आया है।

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प्रिय शिव, भोले हो पर गजब के हो…

  श्रावण मास में शिव खुद ब खुद याद आने लगते हैं। स्‍वभाव से भोले, गायों (संपदा) की रक्षा करने वाले और शीघ्र प्रसन्‍न होने वाले प्रिय शिव भक्‍तों की पुकार पर दौड़कर आते हैं। मैंने-आपने उन्‍हें देखा नहीं है, महसूस तो किया ही होगा। मैंने महसूस किया है, इतना करीब कि बता सकता हूं।… पढ़ना जारी रखें प्रिय शिव, भोले हो पर गजब के हो…