sidharth joshi

ओलंपिक मैडल

इस बार ऐसा क्‍या हुआ है कि हर आम और खास को ओलंपिक मैडल चाहिए ही चाहिए, ऐसा क्‍या बदला है कि हम सोचने लगे हैं कि अमरीका, चाइना, ब्रिटेन और रशिया की तर्ज पर हम खेल के महंगे शौक को अपना सकते हैं और दुनिया में देश का डंका बजा सकते हैं ओलंपिक के जरिए।

पहले पीटी ऊषा से लेकर अभिनव बिंद्रा तक जब मैडल लेकर आए, तो अंधे के हाथ बटेर जैसी स्थितियां ही रही है, मिलने पर लोग भौचक रह जाते कि “यार ये ठीक तोप निकली, खैर भारत भाग्‍य विधाता” लेकिन नहीं, अब हमें तो गारंटी से मैडल चाहिए, यह समस्‍या क्‍यों पैदा हुई है ?? क्‍योंकि

राष्‍ट्रीय गौरव बढ़ा है

जिसका पहले नितांत अभाव था, केवल देश के गरियाने वाले बुद्धिजीवी और देश के लोगों से घृणा करने वाले पूज्‍य और देश के पैसे को चूस रहे लोग सरपरस्‍त थे, अब हर गली नुक्‍कड़ पर उम्‍मीद की किरणें बिखर गई हैं, तो मैडल के रूप में ओज भी चाहिए…

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