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स्‍वामी और राजन की खींचतान

रघुराम राजन और स्‍वामी में से कौन सही है और कौन गलत, यह पता करना लगभग असंभव है। रघुराम की अपनी फॉलोइंग है और स्‍वामी की अपनी। आज की हकीकत यह है कि अपने विदेशी संबंधों के चलते रघुराम राजन भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था की धुरी रिजर्व बैंक के लिए अपरिहार्य हो गए हैं। उन्‍हें हटाना मोदी सरकार के बस का होता, तो शायद अब तक हट भी चुके होते। राजनीति, धर्म और अर्थ तीनों की सामानान्‍तर सत्‍ताएं हैं। किसी एक को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, तीनों अपना अस्तित्‍व बनाए रखते हुए भी लगातार एक दूसरे को प्रभावित करती हैं।

वर्तमान दौर में रघुराम की अर्थव्‍यवस्‍था में कुंजी वाली स्थिति है, सो राजनीति से उन्‍हें हटाने की अटकल भी बेमानी लगती है। दूसरी तरफ स्‍वामी के आरोपों को भी हलके में नहीं लिया जा सकता। स्‍वामी छोटी सी बात को पकड़ते हैं और उससे महत्‍वपूर्ण परिणाम हासिल करते हैं, चाहे रामसेतू हो या नेशनल हेराल्‍ड…

अब समस्‍या क्‍या है,

रघुराम राजन के पास ऐसा क्‍या है, जिससे वह प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, मोटे तौर पर यह ब्‍याज दरें हैं। जनता चाहती है कि ब्‍याज दरें कम हों। जितना कम ब्‍याज होगा, उतना ही अधिक ऋण जनता ले सकेगी और धंधों में झोंक सकेगी। रियल स्‍टेट बूम के दौरान भी बैंकों से अच्‍छी मात्रा में ऋण निकल चुका है। इसमें बड़े कॉर्पोरेट भी फंसे हुए हैं। ऐसे में अगर ब्‍याज दरें कम नहीं होती हैं, तो बूम पर सवार होकर अरबपति बने बहुत से कॉर्पोरेट तो कॉर्पोरेट, आम लोग भी बुरी तरह पिस जाएंगे। फिर राजन ब्‍याज दरें कम क्‍यों नहीं कर रहे…

सामान्‍य तौर पर देखा जाए तो अगर ब्‍याज दरें कम कर दी जाती हैं, तो इससे लोग बैंक में पैसा रखने के बजाय अधिक निकालेंगे या पास पड़ा खर्च करेंगे, इससे बाजार में पैसा बढ़ेगा और अंतत: मुद्रास्‍फीति बढ़ेगी, यानी महंगाई बढ़ेगी। वर्तमान सरकार ने पिछली सरकार को जिन मुद्दों पर पटखनी दी है, उनमें महंगाई प्रमुख है। ऐसे में मोदी सरकार भी यह नहीं चाहेगी कि ब्‍याज दरें कम हों, चाहें जनता की मांग पर हां में हां मिलाते रहें।

अब समस्‍या का समाधान क्‍या है,

तो स्‍पष्‍ट है कि अब तक हमारे देश से ही धन बाहर जाता था, और अंतत: देश में विदेशी निवेश के नाम पर लौटता रहा, हमारा देश इतना अधिक निर्यात नहीं करता है कि हम तगड़ा कमाकर लाएं, दूसरी तरफ धन का अवैध आवागमन भी थम रहा है, ऐसे में मुद्रा पर दबाव बनना स्‍वाभाविक है।

देश की आर्थिक स्थिति या कहें बैंकिंग की स्थिति सूखे चमड़े जैसी हो गई है, अगर ब्‍याज घटाया तो महंगाई बढ़ेगी और ब्‍याज बढ़ाया तो अर्थव्‍यवस्‍था का भट्टा बैठ जाएगा।

ऐसे में हम यही उम्‍मीद कर सकते हैं कि असली विदेशी निवेश, असली निर्यात (चाहे हथियारों का ही क्‍यों न हो) और असली उत्‍पादन बढ़े (न कि कागजों में) तो ही स्थिति में सुधार आ सकता है…

एक दूसरा कोण यह है कि जिस अर्थव्‍यवस्‍था के मॉडल पर चिंतन हो रहा है, वह वास्‍तव में भारतीय मॉडल हो ही नहीं।

एक बार एक भाषण में स्‍वामीनाथन गुरुमूर्ति ने बताया कि जब हमारा शेयर बाजार चढ़ता है तो सभी प्रमुख अखबार वाह वाह करने लगते हैं, कहते हैं देश तरक्‍की कर रहा है, अर्थव्‍यवस्‍था बूम कर रही है, अगर शेयर बाजार गिरता है, तो हाय हाय करने लगती है, यह पश्चिमी मीडिया की अंधी नकल है। वास्‍तव में अमरीका और इंग्‍लैंड जैसे देशों में देश की कुल जीडीपी का आधे से अधिक हिस्‍सा शेयर बाजार से जुड़ा होता है। ऐसे में शेयर बाजार का उतार चढ़ाव पूरी अर्थव्‍यवस्‍था को प्रभावित करता है, वहीं भारत में जीडीपी का महज 2 प्रतिशत हिस्‍सा ही शेयर बाजार से जुड़ा है, ऐसे में शेयर बाजार उठे या गिरे, हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को कोई खास फर्क नहीं पड़ता। भारतीय जनता का अधिकांश पैसा तो पोस्‍ट ऑफिस और एलआईसी में फंसा पड़ा है

बाकी स्‍वामी और राजन की खींचतान तो चलती रहेगी।

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