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सफाई और सजगता

जिन मित्रों की प्रोफाइल में 500 से अधिक मित्र जुड़े हैं, क्‍या वे सभी मित्रों को निजी तौर पर जानते हैं, या कभी यह पता किया है कि जो प्रोफाइल कभी आपकी पोस्‍टों पर लाइक कमेंट नहीं करती, क्‍या वे फेक आईडी हो सकती हैं??

ब्‍लॉगिंग के जमाने में एक एनानिमस महाराज हुआ करते थे, वे इतना अधिक पढ़ते थे कि किसी की दो साल पुरानी किसी पोस्‍ट पर कही हुई बात तक को कोट करके लेखक की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे। वास्‍तव में एनानिमस कोई सिंगल आईडी नहीं थी, बल्कि ब्‍लॉगर प्‍लेटफार्म ने निजता को बरकरार रखते हुए किसी पोस्‍ट पर अपनी बात रखने के लिए यह एक गली निकाली हुई थी, कि पाठक एनानिमस यानी अज्ञात के रूप में टिप्‍पणी कर सके। हर कोई जानता था कि टिप्‍पणी करने वाला कोई नियमित पाठक ही है, लेकिन सामने नहीं आ रहा है।

फेसबुक ने ऐसी कोई सुविधा नहीं दी, जो वार्ता होनी है, वह आमने सामने ही होनी है, ऐसे में लोगों ने फेक आईडी बनाई। बहुत से सरकारी कर्मचारियों, कॉर्पोरेट कर्मचारियों अथवा राजनीति से जुड़े लोगों ने भी फेक आईडी बनाकर ही इस प्‍लेटफार्म पर वर्षों से अपनी जगह बना रखी है। जो लोग उन्‍हें निजी तौर पर जानते हैं, वे कभी रहस्‍य उजागर नहीं करते। ऐसी आईडी के लेख अथवा प्रतिक्रियाएं ही फेसबुक पर उनकी स्‍वीकार्यता को बनाती हैं। ऐसे में बहुत सी फेक आईडी ने अपनी जगह बनाई है।

वर्ष 2009 से 2013 तक फेसबुक इतना तगड़ा टूल नहीं था, लेकिन समय के साथ साथ सोशल मीडिया बहुत खरतनाक टूल बनकर उभरा है। यह जनता की राय बनाने या बदलने की कुव्‍वत हासिल कर रहा है। ऐसे में मेन स्‍ट्रीम मीडिया के जरिए जनता के दिमाग से खिलवाड़ करने वाले अथवा डॉक्‍यूमेंट्री बनाकर सुदूर क्षेत्रों में रह रहे लोगों का ब्रेन वॉश करने वाले गैंग अब सोशल मीडिया पर भी सक्रिय होने लगे हैं।

समान विचार वाले लोगों का समूह चाहे कितना भी बड़ा हो, लेकिन समान विचार और एक राय होने में फर्क होता है। जब ब्रेन वाशिंग वाले लोग काम करते हैं तो अपराध की तरह एक राय होकर काम करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि शुरूआत में ही समान विचार वाले लोग भी धड़ों में बंटते चले जाते हैं।

इन दिनों ठाकुर, बामण और बणियों की ऐसी फेसबुक आईडी दिखाई देने लगी हैं, जिनकी प्रोफाइल पर उनका वास्‍तविक अता पता दिखाई नहीं देता। दूसरी ओर दलितों के मामले में फेक आईडी को सुविधा रहती है कि कुमार या ऐसा कोई दूसरा उपनाम लगाकर दे दनादन ऊटपटांग अपडेट शुरू करता है।

जाति की श्रेष्‍ठता, आरक्षण, राजनीति पार्टी, इतिहास, वर्ण व्‍यवस्‍था, रंगभेद, स्‍थानगत श्रेष्‍ठता जैसे इंसानी कमजोरियों से ओत प्रोत मुद्दों पर ये लोग जमकर लिखते हैं और इंसान के भीतर की कमजोरी को आपराधिक ताकत में बदलने का काम करते हैं।

समस्‍या तो स्‍पष्‍ट है, इसका समाधान क्‍या है, मेरी समझ के अनुसार इसके कुछ सपाट और सटीक समाधान हैं…

1. जिस मित्र को जानते नहीं है, उससे जुड़ने में शीघ्रता न दिखाई जाए।

2. अगर किसी नए मित्र से जुड़ रहे हैं, तो एक बारगी उसकी प्रोफाइल को पढ़ लिया जाए, अगर वहां अधिक अपडेट नहीं है, तो थोड़े समय इंतजार किया जाए, ताकि अपडेट आने पर तय हो सके कि नए व्‍यक्ति की सोच का कोण क्‍या है

3. समय समय पर प्रोफाइल की सफाई करते रहें…

4. जो उग्र पोस्‍ट डाल रहे हैं, उनसे संदर्भ पूछे जाएं, फिर चाहे वह किसी भी समूह से जुड़ा क्‍यों न हो…

5. जो लोग लंबे समय से आपसे जुड़े हैं, लेकिन निष्क्रिय हैं, उन्‍हें धीरे से अलग कर दें, जिसे केवल आपको पढ़ने की जरूरत होगी, वह आपको फॉलो कर सकता है।

6. केवल प्रोफाइल में दिए नाम के आधार पर उसकी पोस्‍टों से धारणा न बनाएं।

आपकी फेसबुक मित्रता सूची बहुत बड़ी होना, आपके प्रसिद्ध होने की गारंटी नहीं है, हो सकता है आपके अधिकांश मित्रों को आपके अपडेट दिखाई भी नहीं देते हों। अगर आपकी मित्रता सूची में पांच हजार मित्र हैं और उन सभी को आपका अपडेट दिखाई दे रहा है, तो कम से कम एक हजार लाइक या कमेंट तो आने चाहिए, नहीं??

लेकिन ऐसा होता नहीं है। एक विशेषज्ञ के अनुसार आपकी पोस्‍ट आपकी मित्रता सूची के बीस प्रतिशत हिस्‍से से ऊपर लोगों को दिखाई नहीं देती। फिर लाइक कमेंट के आधार पर उनसे संबंधित मित्रों तक आपकी पोस्‍ट पहुंचती है, न कि आपकी प्रोफाइल से जुड़े हर मित्र तक…

हर एक फ्रेंड जरूरी होता है, लेकिन फेसबुक पर यह जुमला नहीं चलता

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इस पोस्‍ट से यह आशय भी नहीं लगाया जाना चाहिए कि अपनी आईडी से जुड़े सभी ढाई हजार लोगों को मैं जानता हूं, या मुझसे कोई अनचाही फेक आईडी नहीं जुड़ी है, लेकिन मैं नियमित सफाई करने का प्रयास करता हूं और नए लोगों से जुड़ने से पहले उनकी आईडी भी एक बारगी खंगाल लेता हूं। इससे कह सकता हूं, ढाई हजार न सहीं एक हजार से अधिक फेसबुक मित्रों को थोड़ा बहुत जानता ही हूं…

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