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दिव्‍यांग तन्‍मय

दिव्‍यांग तन्‍मय को सहानुभूति की जरूरत है…

मैं देख रहा हूं कि दो दिन से तन्मय भट्ट को जार जार गालियां दी जा रही हैं। वास्‍तव में तन्‍मय को भारतीय जनता की सहानुभूति की जरूरत है। हमारे साथ दिक्‍कत यह है कि हम केवल शरीर से विकलांग लोगों को ही विकलांग मानते हैं। ऐसे में मानसिक विकलांग उस सहानुभूति से महरूम रह जाते हैं, जिसके वे वास्‍तव में हकदार हैं।
केवल मानसिक रोग ही नहीं, हमारे दिमाग से संबंधित कई प्रकार के रोग होते हैं। इनमें से एक रोग डाउन सिंड्रोम भी होता है। कुछ मामले ऐसे होते हैं, जब संतान का गर्भावस्‍था में ठीक प्रकार पोषण नहीं हो पाता और जेनेटिक डिसऑर्डर से वे डाउन सिंड्रोम के साथ पैदा होते हैं। पैदा होते ही उनका सिर बड़ा, पेट थुलथुल और शरीर ढीला होता है।

हो सकता है तन्‍मय डाउन सिंड्रोम का शिकार हो। टाइम्‍स ऑफ इंडिया ने वर्ष 2014 में एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें बताया गया था कि वर्ष 2011 तक हमारे देश में 20 करोड़ मानसिक रोगी हैं। अब ये सभी मानसिक रोगी शरीर से तो दुरुस्‍त हैं, लेकिन मानसिक रोग ने इनकी सहज सोच को हर लिया है। ऐसे में किसी रोगी अथवा विकलांग इंसान को गाली निकालना तो किसी भी सूरत में सही नहीं है।

अब समस्‍या यह है कि पढ़े लिखे लोग भी जब इस बात को समझ नहीं रहे हैं तो फिल्‍म लाइन से जुड़े लोग, जो आमतौर पर दसवीं फेल होते हैं, उनसे कैसे उम्‍मीद की जा सकती है कि वे इस दिव्‍यांगता को समझ पाएंगे। इसका नतीजा यह हुआ कि तन्‍मय और उसके जैसे कुछ और दिव्‍यांगों ने मिलकर पिछले साल एक कार्यक्रम का आयोजन किया, उसमें बुद्धिजीवी जैसे दिखाई देने वाले फिल्‍मलाइन से जुड़े डफर लोगों ने अपनी मां बहन के सामने अपने निजी अंगों और निजी क्रियाओं पर जमकर चर्चा की, यह सबकुछ करोड़ों लोगों ने यूट्यूब पर देखा।

फिर भी मानसिक विकलांगों (दिव्‍यांगों) को गाली देने के बजाय आगे बढ़कर उनका ईलाज कराए जाने की जरूरत है। अगर बाजार में काबिल दवाएं आ चुकी हों तो ठीक है, वरना एकबारगी शॉक ट्रीटमेंट से शुरूआत की जा सकती है।

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