facebook · sidharth joshi

थोथे वेदविज्ञ

फेसबुक पर मुझे दो प्रकार के लोग मिले हैं। एक तरफ भगवान सिंह जी हैं, जो यह कहते हैं कि पिछले चालीस साल से ऋग्‍वेद पर अध्‍ययन करने के बाद अब तक इसकी पपड़ी खरोंच सकने जितना ही समझ पाया हूं। वे एक पुस्‍तक लिखते हैं हड़प्‍पा सभ्‍यता और वैदिक साहित्‍य, यह अकेली किताब 615 किताबों का संदर्भ लेकर तैयार की जाती है और इस अकेली किताब में सैकड़ों पूर्व धारणाओं का खण्‍डन और नई सोच का मण्‍डन करने की क्षमता है

वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे छिछोरे लोग भी मिलते हैं, जो दो चार ग्रंथों की हिंदी टीका पढ़ने के बाद वेदविज्ञ बनकर बैठ जाते हैं और सनातन मान्‍यता को ऐसे गरियाते हैं जैसे बाप दादाओं ने उन्‍हें वीर्य के साथ एक्टिव ज्ञान ट्रांसफर करके दिया हो…

शास्‍त्र गूढ़ है, परिस्थितियां कठिन है, कडि़यां खो चुकी हैं, लेकिन संभावनाएं अब भी बरकरार है, खुद को वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला साबित करने के चक्‍कर में शास्‍त्र को गरियाने का ठेका मत लीजिए, अभी आपकी उस शास्‍त्र को पढ़ने की औकात भी नहीं हुई है और आप टीका करने की सोचने लगे हैं। वही वेद है, एक आयुर्वेद के सूत्र निकालता है, दूसरा ज्‍योतिष और तीसरा अद्वैत वेदान्‍त निकाल लेता है…

थोथा अहम एकबारगी फेसबुकी लाइक दिला देगा, क्‍योंकि पढ़ने वाले उसी कश्‍ती पर सवार हैं, जिस पर ऐसे “वैज्ञानिक” सवार हैं, लेकिन अर्धसत्‍य का तनाव एक दिन आपको ही भीतर से तोड़ देगा…

फिर उपजी विनम्रता भी केवल पश्‍चाताप भर होगी…

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