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अधरम् मधुरम्

कृष्‍ण की बांसुरी में छह इंद्रियों पर नियंत्रण का संकेत भले ही स्‍पष्‍ट हो, लेकिन उससे अधिक कृष्‍ण का यह संदेश मुझे अधिक लुभाता है कि

प्‍यारे भक्‍त केवल नियंत्रण के लिए ही नियंत्रित मत कर, उससे विश्‍व को आनन्दित करने वाले सुर भी निकलने चाहिए।

कृष्‍ण की बांसुरी में वह राग है जो एक एल्‍केमिस्‍ट की तरह सृष्टि की रचना को बदलने की क्षमता पैदा करती है।

केवल लकड़ी के खोखले टुकड़े से निकलने वाली आवाज भर नहीं, जादूगर के खुद के प्राणों का संयम भी दांव पर है…

भीतर का संगीत है जो बिना चोट के निकल रहा है…

प्राण वायु श्‍वास के साथ मिलकर बांसुरी के निर्जीव छिद्रों में प्राण फूंक देती है…

फिर पूरा विश्‍व उस मधुर संगीत के साथ एकात्‍म होता दिखाई देता है…

अधरम् मधुरम्

अहा।

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