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नरेन्‍द्र मोदी बनाम भाजपा समर्थक

दो साल पहले नरेन्‍द्र मोदी की सरकार बनी… कुछ लोग इसे एनडीए तो कुछ भाजपा की सरकार कहते हैं, इसी तथ्‍य को लेकर मोदी का विरोध किया जा रहा है। निजी तौर पर देखा जाए तो मुझे अब तक कोई भी तार्किक व्‍यक्ति प्रधानमंत्री का विरोध करता नजर नहीं आया है। इन दो सालों में अधिकांश कार्टूनबाजी या तो भाजपा वालों ने की है या फिर विपक्ष ने।

मोदी समर्थक कभी नहीं कहते कि वे भाजपा समर्थक हैं। कांग्रेस को चैलेंज करने के लिए खड़ी हुई हिदुत्‍ववादी पार्टी भाजपा के नेताओं को लगभग वही हथकंडे अपनाने पड़े जो कांग्रेस साठ साल से अपना रही है। कुल मिलाकर पार्टी स्‍तर पर देखा जाए तो दोनों पार्टियों में अधिक अंतर नहीं है।

बहुत से नेता तो कांग्रेस छोड़कर भी आए हुए हैं। ऐसे में भाजपा से अथवा एनडीए से किसी प्रकार की उम्‍मीद करना बेमानी होगा। हमें या कहें कम से कम मुझे मोदी समर्थक के तौर पर भाजपा या घटक दलों से किस प्रकार की उम्‍मीद नहीं है। वे पहले भी भ्रष्‍ट मानसिकता और भ्रष्‍ट आचार वाले रहे हैं, आगे भी रहेंगे।

अब मोदीजी को अगर प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुंचना है तो भाजपा का रास्‍ता ही अख्तियार करना होगा। अब सवाल यह है कि मोदीजी की इस पद पर बैठाने की जरूरत क्‍या है, जब दोनों पार्टियां एक ही स्‍टैंड पर खड़ी हैं…

इसका जवाब आपको किसी भी सरकारी कॉलेज में मिल जाएगा, वहां विद्यार्थियों की शिकायत होती है कि शिक्षक पढ़ाने नहीं आते और शिक्षकों की शिकायत होती है कि विद्यार्थी कक्षाओं तक ही नहीं पहुंचते। कुल मिलाकर कॉलेज में पढ़ाई के अलावा हर चीज का माहौल बना रहता है।

जब भी भ्रष्‍टाचार की बात आती है, दो तरह की धाराएं पेश कर दी जाती हैं। कुछ कहते हैं जनता ही भ्रष्‍ट है, सो ऐसे लोगों को चुनती है जो भ्रष्‍ट है, सो भ्रष्‍टाचार नीचे से होते हुए ऊपर जाता है। दूसरी धारा कहती है कि ऊपर की ओर कुछ भ्रष्‍ट लोग बैठे हैं जो जनता को भ्रष्‍ट होने के लिए मजबूर करते हैं।

इस अंडे और मुर्गी वाले खेल का कहीं तो अंत होना ही चाहिए। ऐसे में मोदीजी की जरूरत है। वही प्रशासनिक ढांचा है, जिसके बारे में कहा जाता था कि यह अपने बाप की भी नहीं सुनता, यहां तक कि कुछ चुने हुए प्रतिनिधि भी रोते हुए दिखाई देते थे कि सरकारी अधिकारी उसके कहने में नहीं हैं। आज स्थिति यह है कि आम आदमी भी ठीक प्रकार अपनी शिकायत पहुंचाए तो सरकारी अधिकारी सेवक की तरह दौड़ पड़ते हैं।

अंडे मुर्गी का खेल खत्‍म हो रहा है, ऊपर से भ्रष्‍टाचार को गिरफ्त में लेने की कार्रवाई शुरू हुई है। अब देखते हैं अंडा बचता है या मुर्गी। जब ऊपर से भ्रष्‍टाचार की अनुमति नहीं होगी और डंडा पूरी ताकत से पड़ेगा तो नीचे वालों के लिए भ्रष्‍टाचार का स्‍थान नहीं बचेगा।

ऐसा नहीं है कि सबकुछ सुधर चुका है, सुधार आ रहा है, धीरे धीरे आ रहा है, इसका असर दिखने लगा है। जो चीज सालों में सड़ी है, उससे बनाने में वक्‍त तो लगेगा ही… राजतंत्र के बाद हम छद्म राजतंत्र की चपेट में आ गए, पहली बार लोकतंत्र आ रहा है… इसे समझने और काम में लेने की तमीज आने में भी वक्‍त तो लगेगा ही…

मोदीजी आप आगे बढ़ें, हम आपके साथ हैं

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