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धोरों की खुशबूू

पिछले दिनों जयपुर और दिल्‍ली दोनों मैट्रो शहरों में घूमा, इसके बाद भरतपुर और मथुरा भी…

लगातार यात्राओं के बाद बीकानेर की ओर लौटते हुए एक प्‍वाइंट ऐसा आता है जब बलुई रेत की सौंधी खुशबू नथूनों से टकराने लगती है। हम रेगिस्‍तान के लोग रेत से ही खुश हैं। चाहे कितनी समृद्धि दिखा दी जाए, जब तक धोरे नहीं दिखेंगे हमारे चेहरे पर न खुशी आएगी न संतुष्टि…

यह सोने की चमक लिए रेत भी माया का विकट रूप है, शहद गिरे या दूध, सुरा गिरे या खून सबकुछ सोख लेती है, समय का चक्र पूरा घूमता भी नहीं है और कल तक के यथार्थ तक को आज बीता हुआ स्‍वप्निल इतिहास बना देती है… कोई चिह्न तक बाकी नहीं रहने देती…

कुछ पत्‍थर की हवेलियां हैं, लेकिन वे भी यही कहती हैं कि कल यहां यौवन था आज कबूतर बोल रहे हैं। कब मिट्टी हो जाएं पता नहीं…

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