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अर्जुन और कर्ण

आज सोच रहा था, उस दृश्‍य के बारे में जब कर्ण का रथ रणभूमि में धंसा हुआ था और अर्जुन अपना तीर कर्ण की ओर ताने हुए खड़ा था।

मृत्‍यंजय में शिवाजी सावंत लिखते हैं कि उन्‍हें मृत्‍युंजय लिखने का ख्‍याल ऐसी घटना से आया जब वे खुद एक नाटिका में अर्जुन का रोल कर रहे थे और कर्ण बने पात्र ने ऐसी आर्त्र पुकार की कि वे स्‍तंभित हो गए।

मुझे लगता है इस दृश्‍य में कुछ चूक है, कुछ गड़बड़ है। सूत के घर पैदा हुआ फौलाद का बना महायोद्धा तब के सबसे बड़े राजवंश को चुनौती देता है। महाभारत के युद्ध के प्रमुख सूत्रों में से एक जब अपने रथ का पहिया कीचड़ में धंसा होने पर उसे निकालने के लिए नीचे उतरता है, उसी क्षण अर्जुन उस पर निशाना लगा रहा होता है।

बेरहम युद्ध में जहां अपने पराए का भेद खत्‍म हो जाता है, वहां एक सप्‍ताह से अधिक लंबे समय तक नरसंहार कर रहा योद्धा क्‍या आर्त्र पुकार कर सकता है, क्‍या युद्धनीति की दुहाई दे सकता है।

मैं सोचता हूं वह दृश्‍य कुछ ऐसा रहा होगा कि –

कीचड़ में धंसे रथ के पहिए को निकालते समय गर्दन घुमाकर कर्ण देखता है कि अर्जुन उस पर तीर ताने हुए है, कृष्‍ण अर्जुन को कुछ कह रहे हैं, क्षणों के अंतराल में कर्ण समझ जाता है, वह मुस्‍कुराता है, जवाब में कृष्‍ण और अर्जुन भी मुस्‍कुराते हैं, तीर निकलता है, युद्ध की थकान से क्‍लांत कर्ण के गले को चीरता एक तीर आर-पार हो जाता है।

उन कुछ क्षणों के अंतर में जहां कर्ण अपनी गति पा लेता है वहीं अर्जुन के लिए अगला कुछ समय विषाद का रहा होगा।

यांग को खत्‍म करने के साथ ही यिन अपनी उपादेयता भी खत्‍म कर चुका होगा। कर्ण का शरीर मिट्टी में मिला, लेकिन अर्जुन की अस्तित्‍व उसके साथ ही खो गया….

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