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हिंदी की मुफ्तखोरी

बहुत साल पहले की बात है, एक इंटरनेट जंगल हुआ करता था, इसमें बहुत से पक्षी कच्‍ची पक्‍की रागें सुनाया करते थे, किसी का अलाप श्रेष्‍ठ था तो किसी का सुर पक्‍का था कोई बैठे गले से गाता था तो कुछ पंचम सुर वाले भी थे…

इंटरनेट जंगल में इससे कुछ पहले बहुत सूनापन था, क्‍योंकि ब्‍लॉगिंग का कोई प्‍लेटफार्म नहीं था, सो गूगल गुरु ने अपनी साधना के बल पर प्‍लेटफार्म बना दिया था, सो सभी पक्षी यहीं आकर गीत सुना जाते। हर किसी का अपना अंदाज था, बात इतनी ही थी कि जंगल प्रकृति ने दिया ये पक्षी भी इसी जंगल का भाग थे।

एक दिन यूं हुआ कि एक पक्षी ने इठलाकर कहा कि इस शामिल बाजे में मेरा कंठ सर्वश्रेष्‍ठ है, सभी मुझे पढ़ते हैं, लेकिन कोई सराहना नहीं करता, और तो और कुछ चोट्टे मेरी नकल करते हुए गाने लगे हैं, मैं उनकी भर्त्‍सना करता हूं।

इतना सुनना था कि पक्षियों का संगीत सुनकर भरे बैठे गिद्धों ने सियारों से सीखी विधि से हुआं हुआं करनी शुरू कर दी कि हरामखोरों इस जंगल में जो प्‍लेटफार्म मिला है, वह गूगल गुरु ने तुम्‍हें “फोटक” में दिया है। यहां सबकुछ गूगल गुरु का दिया है, यहां तुम्‍हारा क्‍या है जो हेकड़ी मार रहे हो..

बात सही थी, लेकिन यह अधूरा सत्‍य था, इंटरनेट जंगल के सूनेपन को खत्‍म करने और संगीत (सर्च) की संभावना को बढ़ाने के लिए गूगल बाबा ने यह प्‍लेटफार्म दिया। जब इंटरनेट पर कुछ होगा नहीं तो लोग क्‍या खाक सुनेंगे। सो प्‍लेटफार्म दिया गया।

अब जो संगीत आ रहा था, वह किसी कोण से फोकटिया नहीं था, अपने दिल की गहराइयों से पक्षियों ने वह संगीत रचा, लेकिन यह समझ नहीं पाए कि बाद में आए लोग इस संगीत का आनन्‍द लेने का तैयार हैं, लेकिन इसके बदले में महत्‍व देने को तैयार नहीं है, सो फोकटिया फोकटिया कहकर उनका मोरल डाउन कर दिया। सभी संगीत का आनन्‍द ले रहे थे, लेकिन कहीं महत्‍व नहीं मिल रहा था, आखिर धीरे धीरे पक्षी उस प्‍लेटफार्म से उड़कर दूर जाने लगे। हालांकि अब भी वहां की कुछ डालों पर कुछ पक्षी बैठे कच्‍ची पक्‍की रागें गा रहे हैं, क्‍योंकि उन्‍हें तो गाने से ही मुक्ति मिल रही है, लेकिन बाकी पक्षियों के लिए इतना पर्याप्‍त नहीं था।

इस बीच पक्षियों को पता चला कि जंगल के किसी दूसरे कोने में कुछ ऑफलाइन भेडि़यों ने हाथी मार गिराया है और जमकर मौज उड़ा रहे हैं। उनकी हुआं हुआं में संगीत खोज रहे सरकारी इमदाद को लेकर पक्षियों में चिल्‍ल पौं मची तो एक बार फिर कुछ गिद्ध भड़क गए और बोले “बे, तुम फोकटिए क्‍या जानो कि क्‍या होती है ऑफलाइन साधना…”

पक्षियों के संगीत से सराबोर रहने वाले अब भी समझ नहीं पा रहे हैं कि पहले जो चीज फोकट में प्रचुर मात्रा में उपलब्‍ध थी, उसका स्रोत सूखता क्‍यों जा रहा है… ???

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