ईश्‍वर · sidharth joshi

सुख और दुख

सुख और दुख को उसने कुछ इस तरह डिफाइन किया कि हर बार खुद उलझता चला गया। अब मेरे लिए मजे का खेल बनता जा रहा था।

बात शुरू होने से पहले मैं जानता था कि वह मुझसे सवाल पूछ रहा है। लेकिन हकीकत में जवाब खुद ही जानता है।

जितना अधिक बोल रहा था। उसके लिए छिपाने या बचने के रास्‍ते खत्‍म होते जा रहे थे। उसकी खीज का यही एकमात्र कारण नहीं था।

दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि किसी इंटेलिजेंट से इंटेलिजेंट और शातिर से शातिर दिमाग वाले से भी नहीं सुलझ सकने वाली उसकी समस्‍याओं को मैं मुस्‍कुराते हुए सुन रहा था।

हद यह हुई कि वह उठकर जाने के बारे में सोचने लगा। मैंने पुचकारने के अंदाज में उसे फिर बरगलाया, मानो उडीक ही कर रहा था। वापस बैठ गया। अब मैंने गंभीर होने का ढोंग किया।

वह क्‍लीयर था कि मैं ढोंग कर रहा हूं, लेकिन वह पचा गया। मेरी ओढ़ी हुई गंभीरता उसके मुफीद थी। यों ही कोई परेशान थोड़े होता है।

ईश्‍वर हंसा होगा जब मैंने उसे कहा “भाग्‍य का ठेका मेरे पास है” और वह मान भी गया।

ईश्‍वर जरूर हंसा होगा, उस नादान पर।

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