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वायदा बाजार और महंगाई

ये कभी चुनावी मुद्दा नहीं था, और हो भी नहीं सकता, कभी किसी नेता ने इसके खिलाफ खुलकर भी नहीं बोला है। लाखों करोड़ का सलाना व्‍यवसाय करने वाले एनसीडीईएक्‍स और एमसीएक्‍स अधिकृत सट्टेबाजी के गढ़ बन चुके हैं। हालांकि इस ट्रेड में शामिल लोगों के कई नाम हैं, मसलन ट्रेडर्स, हैजर्स और सटोरिए।

हकीकत में इस अधिकृत सट्टाबाजार में पहले उड़द, फिर ग्‍वार और अब आम उपभोक्‍ता की आवश्‍यकता की कमोबेश सभी वस्‍तुएं शामिल हैं, जो नहीं होनी चाहिए। पिछले कुछ समय से दालों के भाव आसमान छू रहे हैं।

बिना ऑनलाइन बाजार में बिक्री किए कोई आढ़तिया इतनी फसल को रोककर नहीं रख सकता। कालाबाजारी के लिए आज ऑनलाइन कमोडिटी एक्‍सचेंज आवश्‍यक औजार है। ऐसे में दालों की बढ़ती कीमतों पर सरकार की शांति तूफान से पहले की शांति भी साबित हो सकती है।

मैं बहुत कम शब्‍दों में लिख रहा हूं, लेकिन समझ लीजिए कि अगले कुछ महीनों में महंगाई का ठीकरा इन ऑनलाइन एक्‍सचेंजों पर फूटे और उन्‍हें बंद कर दिया जाए, या उनके ट्रेड पर बुरी तरह लगाम लगा दी जाए, तो आश्‍चर्य करने की बात नहीं होगी, रातों रात दाल चालीस पचास रुपए किलो के भाव आ जाएगी।

अगर यह महंगाई इन एक्‍सचेंजों के लिए कब्र साबित होती है, तो यह भी अच्‍छी बात ही है। अगर फारवर्ड मार्केट कमीशन को सेबी की तरह प्रभावी बनाने वाली साबित होती है तो और भी अच्‍छी बात है।

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