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युधिष्‍ठर के चंगुल में यक्ष

तालाब के किनारे यक्ष प्रकट हुआ और युधिष्‍ठर ने आव देखा न ताव सीधे एक कंटाप यक्ष को जड़ दिया। झन्‍नाटे से भौचक यक्ष ने प्रश्‍न किया

“राजन, ये कंटाप किसलिए ?”

युधिष्‍ठर मन ही मन मुस्‍कुराया, सोचा अभी अलटप्‍पू सवाल कर करके मुझे परेशान करता, झन्‍नाटे में सही सवाल पूछ रहा है। प्रत्‍यक्ष में युधिष्‍ठर ने कहा,

रे, यक्ष अब सवाल मैं करूंगा और जवाब तुझे देना है, अगर मेरे सवाल का सही सही जवाब नहीं दिया तो जोड़ जुगाड़ से अब तक लिए सारे पुरस्‍कार और सम्‍मान भी छीनकर ले जाउंगा। यक्ष कांपने लगा। युधिष्‍ठर ने पूछा

“आधी सदी तक पुरस्‍कारों और सम्‍मान पर कीचड़ उछालते रहे साहित्‍यकार ये मानते रहे कि पुरस्‍कार और सम्‍मान हमेशा सेटिंग से ही मिलते हैं, वही साहित्‍यकार अचानक इतने हरिश्‍चंद्र और दाधीच कैसे बन रहे हैं। मीडिया भी इनके सम्‍मान और पुरस्‍कार लौटाए जाने की बात तो कर रहा है, लेकिन जोड़ जुगाड़ की बात पर कोई चूं तक नहीं कर रहा??”

यक्ष कोई जवाब नहीं दे पाया, तो युधिष्‍ठर ने मरने का नाटक कर रहे अपने ऊंघते भाइयों को झकझोरा और लेकर चलता बना।

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