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तीन महीने में पतरकार

पिछले कुछ दिन से फेसबुक पर एक विज्ञापन गोते लगा रहा है, जिसमें बताया गया है कि दसवीं पास छात्र तीन माह की ट्रेनिंग से पत्रकार बन सकते हैं।

इस पर टीका टिप्‍पणी करने वाले लोगों को लगता है कि दसवीं पास बेरोजगार पत्रकार नहीं बन सकता तो जान लें कि कैम्ब्रिज में पीएचडी कर चुका इंसान भी पत्रकार नहीं बन सकता है, हां ट्रेनिंग की अवधि जरूर कम है।

मेरे पास तो तीन माह का डिप्‍लोमा भी नहीं है और छह साल तक पत्रकारिता करके आ चुका हूं। कमोबेश ठीक ठाक ही थी, छह सालों में पत्रिका के छह इन हाउस पुरस्‍कार लिए, जिनमें स्‍पेशल कवरेज से लेकर एक्‍सक्‍लूजिव स्‍टोरी तक के पुरस्‍कार शामिल रहे।

मैं सोचता हूं पत्रकारिता का अपना धर्म है, किसी डिग्री या किसी ट्रेनिंग अवधि का मोहताज नहीं। मैंने ऐसे वरिष्‍ठ पत्रकार भी देखे हैं जो सड़क पर भीड़ दिखने पर रास्‍ता बदलकर समय पर ऑफिस पहुंच जाते थे और ऐसे भी देखे हैं जो ड्यूटी खत्‍म होने के बाद घर लौटते हुए किसी घटना के चश्‍मदीद होने पर वहीं रिपोर्टिंग पर लग जाते और फोटोग्राफर से लेकर डेस्‍क तक को एक्टिव कर देते थे।

पत्रकारिता को डिग्री और ट्रेनिंग के मूल्‍यों पर आंकना मुश्किल है। अगर आपको सही मार्गदर्शन मिलता है और आपमें पत्रकारीय दृष्टि विकसित हो पाती है तो ही आप पत्रकार बन पाते हैं, वरना कलमघसीटी तो बहुत लोग कर रहे हैं, वह दृष्टि कुछ ही में दिखाई देती है।

इस विज्ञापन का दूसरा आयाम यह भी है कि इन दिनों प्रिंट मीडिया में ऐसे ही पत्रकारों की खोज की जाती है जो चार से छह हजार रुपए महीने में डेस्‍क पर विज्ञप्तियां घिसने का काम करे, या फिर प्रेस कांफ्रेंस में जाकर एक वक्‍त का भोजन टूक आएं। ऐसे में आप स्‍तरीय पत्रकारिता की उम्‍मीद करते हैं तो आप तो आप ‪#‎RAGA‬ से मानसिक क्षमता की टक्‍कर में हैं।

वर्ष 1990 में प्रिंट मीडिया के एक सब एडिटर की तनख्‍वाह तब के अपर डिवीजन क्‍लर्क से लगभग डेढ़ गुना हुआ करती थी। बाद में पत्रकारों के लिए बने वेतन आयोग ने तो सब एडिटर के वेजेज आरएएस अधिकार के समकक्ष रखने के सुझाव भी दिए। आज एक आरएएस अधिकारी को पांच सात साल की नौकरी के बाद कम से कम चालीस से पचास हजार रुपए मिलते हैं, लेकिन प्रिंट मीडिया में अधिकांश संस्‍थानों में उपसंपादक की सैलेरी दस बारह साल की सर्विस के बाद भी 20 हजार को भी पार नहीं कर पाती है।

अब चार से छह हजार में दसवीं पास और तीन माह की ट्रेनिंग वाले पतरकार ही मिलेंगे, अच्‍छे की उम्‍मीद कौन कर रहा है और कौन पे करेगा…

अरे हां उस मजीठिया आयोग का क्‍या हुआ ???

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