अर्थ · धर्म · संप्रदाय · सत्‍ता · हिन्‍दू

समान्‍तर सत्ताएं…

मुझे लगता है कि देश और काल से परे तीन तरह की सत्ताएं समान्‍तर रूप से सक्रिय हैं। हो सकता है कि मैं समय के फलक पर उड़ती हुई चील नहीं हूं, लेकिन फिर भी निरपेक्ष रहने का प्रयत्‍न करते हुए मुझे लगता है कि धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं साथ साथ चलते हुए एक दूसरे से अलग अपनी पहचान बनाए रखती हैं और एक दूसरे को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।

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धार्मिक – यहां धर्म गीता में वर्णित कर्म ही धर्म नहीं बल्कि वर्तमान दौर में अपनी पूर्व स्‍थापित मान्‍यताओं के साथ जड़ हुए संप्रदाय हैं। इसमें हिन्‍दू, मुस्लिम, इसाई सहित सभी संप्रदायों को शामिल किया जा सकता है। इस सत्‍ता से जुड़े लोग अपनी मान्‍यताओं के साथ इतनी शिद्दत से जुड़े हैं कि इन्‍हें हर समस्‍या का समाधान धर्म में ही नजर आता है। इस कोण में न तो अर्थ का कोई महत्‍व है और न ही राजनीति का। यहां आकर आर्थिक और राजनीतिक की रेखाएं धूमिल होने लगती है।

आर्थिक – इसमें पैसे को ही सबकुछ मानने वाले लोग हैं। वे लोग नहीं जो कहते हैं कि अर्थ का अपना महत्‍व है। इसमें वे लोग हैं जो कहते हैं कि पैसे से सबकुछ किया जा सकता है। उनके लिए धन ही धर्म  है और धन से जुड़ी ही की राजनीति करते हैं। धर्म अथवा राजनीति के समीकरण यहां आकर धुंधले हो जाते हैं। अलग अलग क्षेत्रों, समुदायों, धर्म और शक्तियों से आए लोग यहां केवल धन कमाने और उसे बढ़ाने के लिए एक हो जाते हैं, दूसरे कारण उन्‍हें किसी भी सूरत में प्रभावित नहीं कर पाते। राजनीति – यह जनता के समर्थन का दावा कर, संसाधनों पर काबिज होने, उनके व्‍यवस्थित करने और प्राप्‍त हुए पदों के जरिए राज्‍य को चलाने वाली सत्‍ता है। ये लोग अपनी सत्‍ता को बचाए रखने के लिए धन और धर्म का जमकर उपयोग या दुरुपयोग करते हैं।

(इसमें वे लोग शामिल नहीं हैं, जो सुविधा को सिद्धांत बनाए हुए हैं। धन के लिए काम करते हैं, लेकिन मौका मिलने पर लाभ भी छोड़ देते हैं, या फिर धार्मिक काम करते हैं, लेकिन पैसे लिए कुछ समय के लिए धर्म (संप्रदाय) के नियम सिद्धांतों को ताक पर रख देते हैं।)

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जब मैं इनमें से किसी एक प्रकार की सत्ता के करीब रह रहे, या उसके बारे में सोच रहे लोगों से मिलता हूं तो उनके सभी तर्क, सभी संभावनाएं और आशंकाएं उसी सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती है। उन्‍हें दूसरा पक्ष बताने का प्रयास करता हूं तो वे उसे सिरे से खारिज कर देते हैं। उदाहरण के लिए धार्मिक सत्ता से प्रभावित लोगों को उनका धर्मगुरु आदेश देते हैं कि फलां जगह धर्मशाला और कुछ सुविधाएं बना दो। लोग धन अथवा राजनीतिक प्रभाव की परवाह किए बिना अपने गुरु की इच्‍छा को पूरा करते हैं। इसी तरह आर्थिक और राजनीतिक सत्ताएं अपना प्रभाव व्‍यक्‍त करती हैं। हर सत्‍ता के अपने नियम और पद्धतियां हैं। इनका अनुसरण किए बिना क्षेत्र में आपके आगे बढ़ने की संभावनाएं क्षीण हो जाती हैं। तीनों ही क्षेत्र अपने नियमों और सिद्धांतों को लेकर इतने कट्टर हैं कि “गलती की सजा मौत” के रूप में सामने आती है। राजनीति में इसे पॉलीटिकल एसेसिन कहते हैं तो धर्म में इसे धर्मच्‍युत कहा जा सकता है, धन के क्षेत्र में दीवालिया या बर्बाद जैसे शब्‍द आम हैं।

दूसरे संसाधन दूसरे दर्ज पर

धर्म, राजनीत और धन की सत्‍ताओं में से किसी एक सत्‍ता का चरम भले ही दूसरे संसाधनों को आसानी से उपलब्‍ध करा देता है, इसके बावजूद इन्‍हें साधने वाले साधक को दूसरे संसाधनों को हमेशा ही दूसरे दर्जे पर रखना पड़ता है। इसका परिणाम यह दिखाई देता है कि धर्म गुरु के पास अकूत संपदा होते हुए भी वह उसका वैसा उपयोग नहीं कर पाता, जैसा कि एक व्‍यवसायी कर सकता है, इसी तरह एक राजनीतिज्ञ को धर्म का ज्ञान और धंधे की समझ होने के बावजूद उसे कम ज्ञानी साधकों के सामने झुकना पड़ता है और लाभ के अवसर जानते हुए भी छोड़ने पड़ते हैं। कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि देश के शंकराचार्यों और अन्‍य धर्मगुरुओं के पास आज की तारीख में लाखों करोड़ रुपए की संपत्तियां और धन है, लेकिन वे इसका कोई उपयोग नहीं करते, इसी तरह कई राजनीतिज्ञों को धर्म के बारे में विशिष्‍ट जानकारियां हैं, लेकिन उनके क्षेत्र में इनका कोई उपयोग नहीं है। किसी व्‍यवसायी या बाजार पर राज कर रहे धन के उपासक को ज्ञान और राजनीति की समझ होने के बावजूद वह अपने क्षेत्र तक सीमित रहता है, ताकि उसका बाजार प्रभावित न हो। इसके बावजूद एक सत्‍ता का दूसरी सत्‍ता का प्रभावित करने का खेल जारी रहता है। न तो राजनीति में ऐसे लोगों की कमी है जो धर्म का ध्‍वज उठाए रखते हैं और न धार्मिक सत्‍ता वोटों को प्रभावित करने से चूकती है। इसी तरह बाजार अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए राजनीतिक पार्टियों और धर्म के ठेकेदारों को अपने प्रभाव में रखने का प्रयास करता है।

सत्‍ताओं के बीच विचरण

एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता की ओर गमन के लिए हमेशा ही प्रयास जारी रहते हैं। कुछ लोग इनमें जबरदस्‍त सफलता अर्जित करते हैं तो कुछ औंधे मुंह गिरते हैं। किसी जमाने में इंग्‍लैण्‍ड के हाउस ऑफ कॉमंस में केवल धनिकों को ही जगह मिल पाती थी, वहीं चीन और रूस में धर्म के प्रभाव को खत्‍म करने के बाद एक नया धर्म पेश किया गया कार्ल मार्क्‍स का, उससे सत्‍ताएं केन्‍द्र में आई। कई देशों में आज भी धर्म की सत्‍ता का प्रभाव राजनीति और धन दोनों को बुरी तरह प्रभावित रखता है। भारत के इतिहास में भी ऐसे प्रकरण देखने को मिलते हैं। हालांकि तीनों को अलग अलग रखने के लिए स्‍पष्‍ट नीतियां और सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं, लेकिन समय बदलने के साथ ही इन सिद्धांतों का अतिक्रमण होता है और सत्‍ताएं एक-दूसरे का अतिक्रमण कर जाती हैं। आजादी के बाद पहली पॉलीटिकल पार्टी कांग्रेस ने धर्म को राजनीति से दूर रखा और देश के विकास के लिए धन को शरण दी। लाइसेंस राज स्‍थापित किए गए और कुछ विशिष्‍ट लोगों को अधिकांश सुविधाएं मिली। बाद में जब भाजपा ने धर्म का ध्‍वज बुलंद किया तो देश की जनता ने उन्‍हें भी केन्‍द्र में ला बैठाया। फिर उदारणीकरण के बाद बाजार हावी हुआ तो धर्म की उपादेयता कम नजर आने लगी। ऐसे में भाजपा सत्‍ता से बाहर हो गई और पिछले नौ साल से कांग्रेस फिर केन्‍द्र में है। भले ही आम जनता कांग्रेस की नीतियों से सहमत न हो, लेकिन भाजपा भी विकल्‍प के रूप से अब तक खुद को स्‍थापित नहीं कर पा रही है। प्रचलित धर्मों और धन की सत्‍ता का नैसर्गिक विरोध करने वाले कॉमरेड भी लगभग हाशिए तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में धन के साथ चल रहे धर्म और राजनीति को आज हर कहीं प्रश्रय मिल रहा है।

विचरण का श्रेष्‍ठ उदाहरण

लेख के आखिर में बाबा रामदेव का नाम लेने से कहीं ऐसा न माना जाए कि यह पूरी पोस्‍ट बाबा रामदेव को केन्द्रित करके लिखी गई है। इसके बावजूद एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता में संचरण का कोई श्रेष्‍ठ उदाहरण है तो आज के दौर में बाबा रामदेव है। बाबा रामदेव ने धर्म के जरिए धन के क्षेत्र में प्रवेश किया। आम जनता को धर्म की बातें बताई, योग कराया, स्‍वस्‍थ रहने की अपील की और भगवा धारण किए रखा। उनकी दवा कंपनियां और एफएमसीजी प्रॉडक्‍ट आज दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्‍ता उत्‍पाद बनाने वाली कंपनी हिंदुस्‍तान लीवर लिमिटेड तक को धक्‍का पहुंचा रहे हैं। हजारों करोड़ का साम्राज्‍य खड़ा करने के बाद अब रामदेव दूसरा अतिक्रमण राजनीति में करने का प्रयास कर रहे हैं। दीगर बात यह है कि धर्म और धन को साधने के बाद राजनीति को साधने के लिए उन्‍होंने लगभग सभी प्रचलित मान्‍यताओं को ताक पर रख दिया है। भले ही वे राजनीति में पूरी तरह सफल नहीं हुए हैं, लेकिन केवल धर्म का झंडा या धन की ताकत हाथ में रखकर दूर से प्रभावित करने के बजाय उन्‍होंने सीधे राजनीति क्षेत्र में उतरकर सिद्ध कर दिया है कि विचरण संभव है।

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p align=”center”>ऐसे में दूसरे लोगों के लिए भी संभावनाओं के द्वार खुलने लगे हैं कि किसी एक सत्‍ता से दूसरी सत्‍ता में संचरण किया जा सकता है। आज भले ही यह इतना आसान न लगे, लेकिन आने वाले दिनों में हमारे देश में इन सत्‍ताओं के बीच की रेखाएं और अधिक धूमिल होने की संभावनाएं बन रही हैं।

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6 विचार “समान्‍तर सत्ताएं…&rdquo पर;

  1. समर्थ और इच्छुक के लिए द्वार तो पहल से ही खुले हैं सिद्धार्थ जी, संख्या अवश्य कम थी| योगी आदित्यनाथ, डाक्टर मदनी जैसे उदाहरण धर्म और राजनीति के बीच और विजय माल्या, अमर सिंह,वीडियोकोन वाले मि.धूत जैसे अर्थ और राजनीति में दखल रखते रहे हैं| बाद वाली श्रेणी में तो वड्डे डाक्टर साहब का भी उदाहरण दे सकते हैं, पर वो तो जनक की तरह विदेह हैं, होकर भी न होने जैसे|
    हाँ, आने वाले समय में ये संचरण विचरण जरूर बढ़ेगा|

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