sidharth joshi

क्‍या मैं ऐसा ही हूं… ?

आज रवि रतलामी जी ने चेताया कि आपको अपने ब्लॉगिंग व्यक्तित्व का अता-पता है भी? तो हम भी पहुंच गए यह जानने कि हमसे बेहतर हमें कौन जानता है। वहां पहुंचकर देखा कि महज लिंक पेश करना है और आपके व्‍यक्तित्‍व के बारे में विशद (?) जानकारी उपलब्ध है। पहले अपने एक ब्‍लॉग ज्‍योतिष दर्शन का पता किया तो शानदार परिणाम सामने आया। उत्‍साह के मारे अपने दूसरे ब्‍लॉग दिमाग की हलचल के जरिए भी खुद का परीक्षण कर लिया। वह तो और भी शानदार मिला। वाह… देखिए हमारे व्‍यक्तित्‍व के जो पहलु उभरकर सामने आए हैं। क्‍या वास्‍तव में मैं ऐसा ही हूं।

ज्‍योतिष दर्शन ब्‍लॉग के आधार पर मेरा विश्‍लेषण

The active and playful type. They are especially attuned to people and things around them and often full of energy, talking, joking and engaging in physical out-door activities. The Doers are happiest with action-filled work which craves their full attention and focus. They might be very impulsive and more keen on starting something new than following it through. They might have a problem with sitting still or remaining inactive for any period of time.

sidharth

 

दिमाग की हलचल ब्‍लॉग से मिले विश्‍लेषण का निष्‍कर्ष

The independent and problem-solving type. They are especially attuned to the demands of the moment and are highly skilled at seeing and fixing what needs to be fixed. They generally prefer to think things out for themselves and often avoid inter-personal conflicts. The Mechanics enjoy working together with other independent and highly skilled people and often like seek fun and action both in their work and personal life. They enjoy adventure and risk such as in driving race cars or working as policemen and firefighters.

sidharth d

अपनी इतनी तारीफें पढ़ने के बाद एक वाकया याद आ गया….

एक बार राजस्‍थान के प्रार‍ंभिक शिक्षा निदेशक का सम्‍मान किया गया। उन्‍हें स्‍टेज पर बैठा दिया गया और पढे लिखे और वाकपटु शिक्षकों ने दो घंटे से अधिक समय तक उनकी तारीफों के ऐसे पुल बांधे कि सूरज देवता छिप गए। (मेरा ध्‍यान सूरज देवता पर ही था, क्‍यों‍कि भोज में विलम्‍ब हुआ जा रहा था)। आखिर तारों की रोशनी में निदेशक महोदय उठ खड़े हुए। उन्‍होंने डायस पर आते ही सभी शिक्षकों और कर्मचारियों को तहेदिल से आभार व्‍यक्‍त किया, लेकिन इसके साथ ही अपनी पीड़ा भी व्‍यक्‍त कर दी। उन्‍होंने बताया कि प्राचीन काल में किसी राजा के दरबारियों में किसी व्‍यक्ति को लज्जित करना होता तो राजा उसे सभा में खड़ा कर देता और दूसरे सभासदों से कहता कि इनकी तारीफ में कसीदे गढ़े। जिस व्‍यक्ति की तारीफ राजा के सामने होती वह लज्जित होता रहता। निदेशक महोदय ने कहा कि ज्ञानी लोगों और ईश्‍वर से पहले पूछे जाने वाले गुरुजनों के समक्ष अपनी तारीफें सुनकर उन्‍हें भी लज्‍जा महसूस हो रही है। तबादलों और दूसरे कामों की उम्‍मीद लिए कर्मचारी सकते में आ गए। बाद में निदेशक महोदय ने खुद ही माहौल को हल्‍का कर दिया। ये निदेशक थे श्‍यामसुंदर बिस्‍सा। रिपोर्टर के तौर पर मेरे साथ इनके कई खट्टे मीठे अनुभव रहे, लेकिन इस घटना के बाद मैं निजी तौर पर उनका मुरीद हो गया।

आपने ऊपर मेरी तारीफ तो नहीं पढ़ी ना… मुस्‍कान 

Advertisements

4 विचार “क्‍या मैं ऐसा ही हूं… ?&rdquo पर;

  1. पत्रकारिता की पहली शर्त एडवंचर और रिस्क ही तो है …बढ़िया !अभी सिर्फ अंग्रेजी ब्लॉग की पर्सनैलिटी ही बताई जा रही है …

    Like

  2. @ वाणी जी यह साइट अंग्रेजी भाषा के ब्‍लॉग की ही पर्सनेलिटी बता रहा है, लेकिन जब मैंने अपने ब्‍लॉग डाले तो उनका विश्‍लेषण आ गया। बाद में एक और ब्‍लॉग का लिंक डाला तो साइट ने हाथ खड़े कर दिए। खैर, थोड़ा सा समय खर्च करने के लिए यह बहाना भी ठीक है 🙂 यही सोचकर विश्‍लेषण कर लिया…

    Like

टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है.