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सूनी-सूनी अक्षय तृतीया

आज मैं अपने अनुज आनन्‍द के साथ शहर की तंग गलियों के बीच घूम रहा था तो कुछ पुराने घर दिखाई दिए। अपने नानी के खाली पड़े घर के करीब से गुजरते हुए भी उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की। पास ही एक घर में हम कुछ दिन किराए पर रहे थे, उसकी छत पर आज दूसरे लोग दिखाई दिए। परकोटे में शहर खाली पड़ा था। गलियों और मोहल्‍लों में छाया सूनापन जैसे दिल में उतर गया।

आज अक्षय तृतीया थी, सुबह चार बजे लोग छतों पर चढ़ गए और दिन ढलने पर नीचे उतरे। करीब पच्‍चीस साल तक मेरा भी यही क्रम रहा, लेकिन इस साल कब अक्षय तृतीया आ गई और गुजर गई पता ही नहीं चला। पंद्रह सौ पैतालीस विक्रम संवत में राव बीका ने बीकानेर शनिवार के दिन अक्षय तृतीया पर बीकानेर रियासत की नींव रखी थी। इसी दिन को लोग स्‍थापना दिवस के रूप में 523 साल बाद भी उसी जोश और उमंग के साथ मना रहे हैं।

जिन घरों के करीब से गुजरा था वहां की छतों की खूब यादें जेहन में उमड़ रही हैं। अक्षय तृतीया से पंद्रह दिन पहले से ही मेरे जैसे नौसिखिए पतंगबाजी करनी शुरू कर देते थे।

…बोई काट्या हे,

उडा रे उडा,

थारी नाकड़ ऊपर

घूम रयो, घूमाय रयो

उडा रे उडा….

सालों-साल छत पर चढ़े हुए कई अनुभवों से गुजरा। पहले सिर्फ पतंगबाजी करने के लिए छत पर चढ़ता था। बाद में आस-पड़ोस की सुंदर कन्‍याएं भी देखने लगा। उसके बाद ज्‍योतिष के अध्‍ययन के दौरान हवा का रुख देखता रहता था। तीन-चार साल तक उसी आधार पर खरी-खोटी भविष्‍यवाणियां भी की। कुछ सही रही तो कुछ सिरे से ही गलत हो गई। दोस्‍तों से लड़ाई और दुश्‍मनों से दोस्‍ती तक के काम छतों पर निपट जाते। कभी सी-28 या बरेली का सॉलिड मांझा हाथ लग जाता तो, अश्‍वमेघ यज्ञ शुरू हो जाता। हवा की दिशा की सारी पतंगे काटने तक चुपचाप पेच लड़ाते जाते और अंत में पूरी ताकत से चिल्‍लाते.. बोई काट्या हे…

इस साल ऐसा कुछ नहीं हुआ। बीती रात ऑफिस में काम की अधिकता के चलते देर से घर पर आया, फिर देर तक सोता रहा, फिर गर्मी बढ़ गई। मौसम विभाग में लगे थर्मामीटर में पारा 45:5 डिग्री सेल्सियस को पार कर गया। छतों पर इससे तीन डिग्री तक अधिक तापमान होता है। यानि 49 के करीब। ऐसी गर्मी पहले भी रहती थी, लेकिन महसूस नहीं होती थी, लेकिन आज तो छत पर चढ़ने की हिम्‍मत ही नहीं कर पाया। शाम को अकेला छत पर चढ़ा। दोस्‍त तो सारे बीकानेर छोड़ चुके हैं। भाई को शौक नहीं रहा। सो दो-तीन पतंगें उड़ाकर नीचे चला आया। अब पोस्‍ट लिख रहा हूं। मैं सोचता था, पतंग उड़ाने वाले खुद भी ऊंची उड़ाने भरते हैं, लेकिन आज लगा जैसे जमाना ठहर गया हो…

काश अगली आखातीत कुछ मस्‍त गुजरे…

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6 विचार “सूनी-सूनी अक्षय तृतीया&rdquo पर;

  1. अगली आखातीत कुछ मस्‍त गुजरे…aameen .aap to jaipurwalon ko bikaner ki aakhteej dikhana chate the. khair is mangalparv par shubhkamnaen.

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  2. हां वर्षा जी दिखाना तो अब भी चाहता हूं लेकिन प्रोफेशनल व्‍यस्तता शौक पर भारी हो गई है। हो सकता है अगले साल तक वापस हल्‍का हो जाउं। तब आपको फिर से आमंत्रित करूंगा। व्‍यस्‍त था इसीलिए इस बार ब्‍लॉगर परिवार को आमंत्रित करना तक भूल गया था। न चित्र हुए, न पतंगबाजी और न पोस्‍ट मिली… 🙂

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  3. सोना बेचने वाले प्रचार ना करते तो फिर तो आधे से ज्यादा लोगों को पता भी नहीं चलता इस पर्व के बारे में.

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