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बहुत सोचा अब लिख रहा हूं

थ्री इडियट्स देखी, फिर चकरी ले आया, फिर बार बार देखी, कई बार देखी, बीच- बीच में से देखी। कई सीन दोहराकर देखे, फिर सोचा कि अब लिखूं तो देखा कि लोगों ने जमकर पहले ही लिख दिया है। सुकून की बात यह है कि मैं जो सोचा वह यहां कहीं मिला नहीं और कहीं लिखा भी गया है तो मुझे दिखा नहीं। सो इस बार नए विचार के साथ विशेष तरह से सोचने वालों की बात की जा सकती है।

मेरा विचार यह है कि रैंचो हम में से हर एक में है, फिल्‍म को पहली बार देखते समय हम दो लोग साथ थे, मैं लो प्रोफाइल था और मेरा साथी मुझसे अधिक प्रोफाइल का था। मेरी खासियत यह है कि मैं आपे में बने रहने का भरसक प्रयास करता हूं और मेरा साथी अपनी प्रोफाइल से भी काफी नीचे बना रहकर छोटे से छोटा काम बड़ी तल्‍लीनता से करता है। हम दोनों ने फिल्‍म के दौरान ही यह बात शिद्दत से महसूस की कि हम अपनी-अपनी जिंदगी के एक खास समय में रैंचो थे। बाद में हमने खुद को ढाल लिया और राजू बन गए। ऐसा नहीं है कि हमारा राजूलाइजेशन हो गया बल्कि हमने उसे होना स्‍वीकार किया। फिल्‍म में सभी का ध्‍यान रैंचो की तरह है और सूत्रधार फरहान बना हुआ है इसके बावजूद सबसे तीखा परिवर्तन राजू में होता है।

हम भी राजू ही बनना चाहते हैं, क्‍योंकि रैंचो का तरीका कुछ दिन तो काम कर जाएगा लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में राजू वाली किल्‍लर इंस्टिंक्‍ट ही काम आएगी। ऐसा कब क्‍यों और कैसे होता है यह तो मैं नहीं कह सकता लेकिन आप खुद सोचेंगे तो पाएंगे कि कभी न कभी आपकी जिंदगी में भी ऐसा काल आया होगा जब आपने स्‍थापित नियमों और सिद्धांतों को चुनौती दी और बाकी लोग एकटक पहले से खींची हुई लकीर को देखते हुए उसे ही पीटने की तैयारी कर रहे थे और आप आसानी से आगे निकल गए। वास्‍तव में थिंक आउट ऑफ द बॉक्‍स एक आदत होती है, यह हमें लुभाती है, लेकिन यह अनिश्चित भविष्‍य की ओर लेकर जाती है, इसी अनिश्चितता का डर हमें पूर्व में लिए गए फैसलों जैसे फैसले लेने को बाध्‍य करती है। मैं दोबारा बात करना चाहूंगा तीनों पात्रों की…

रैंचो की अलग सोच

रैंचो के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, उसने तो अपनी जिंदगी शुरू भी नहीं की है लेकिन वह ऐसा बैकअप रखता है जो ढाई करोड़ रुपए महीने के कमाता है और रैंचो की इंजीनियरिंग के लिए उन रुपयों को भी दांव पर लगा सकता है। रैंचो को डिग्री से भी कुछ हासिल नहीं करना है। अब सफल कैसे होगा, वह भविष्‍य के गर्भ में है। अगर रैंचो जीनियस न हो और उसमें वह जज्‍बा न हो तो वह कहां पहुंचेगा। पहले उसने अपने दिल की बात सुनी बाद में पॉल कोएलो आ गए और कहा जब आप किसी चीज को चाहते हैं तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने की साजिश करने लगती है (शाहरुख खान की फिल्‍म में यह डॉयलॉग बाद में आया था), और रैंचो को अपना भविष्‍य मिल जाता है, लेकिन कोई भी उम्रभर कंवारा रहकर अपने दोस्‍तों से अलग नहीं रहना चाहेगा। सो रैंचो का पात्र फिल्‍म बीतने तक कमजोर होने लगता है।

फरहान की दिल की बात

फरहान भी जीनियस है। वह वाइल्‍ड लाइफ फोटोग्राफी करता है। मजे की बात यह है कि उसके फोटोग्राफ हंगरी के आंद्रे इस्‍तवान को पसंद आ जाते हैं। अब मान लीजिए कि मैं एक ब्‍लॉगर हूं और किसी को भी मेरा लिखा पसंद नहीं आता। अब भले ही मैं कितनी भी दिल की क्‍यों न सुन लूं, आटा और दाल लाने के लिए तो रिपोर्टिंग ही करनी पड़ेगी। खबर लाउंगा तो हाजिरी गिनी जाएगी और उसी से तनख्‍वाह मिलेगी। एक सूत्रधार के दिल का सुकून है कि वह जो बनना चाहता था उसे वह बनने में रैंचों ने मदद की लेकिन मैं खुद को देखूं तो लगता है कि बचपन से किसी ऐसी चीज का सपना नहीं रहा। तो अब क्‍या बनूंगा। क्‍या करूंगा। न आंद्रे है न कैमरा न कमरे में एसी। यह कैरेक्‍टर बनाया ही कमजोर गया था। बस सूत्रधार जो रैंचो और राजू को देखता रहता है।

raju

राजू मेरा यार…

सिस्‍टम को दोष देना और जीभरकर गालियां निकाल लेना आसान है लेकिन अपने सिद्धांतों के साथ उसी सिस्‍टम को रूल करना उससे अधिक कठिन काम है। जिन लोगों ने यह किया है वे इसे समझ सकते हैं। एक वाकया याद आता है। किसी चेले ने गुरू से पूछा कि विवेकानन्‍द और रामकृष्‍ण परमहंस में क्‍या अंतर है। तो गुरू ने कहा कि विवेकानन्‍द इतने बड़े हो गए कि माया का जाल उनके लिए छोटा पड़ गया लेकिन परमहंस इतने सूक्ष्‍म हो गए कि माया का जाल उन्‍हें पकड़ नहीं पाया। वास्‍तव में सांसारिक आदमी को… जो शादी करना चाहता है, अपने मां-बाप का ऋण चुकाना चाहता है, अपने लिए प्रॉपर्टी बनाना चाहता है, दुनिया में अपना नाम करना चाहता है, देश के विकास में भागीदार बनना चाहता है, इज्‍जत और शोहरत के लिए कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार है वह विवेकानन्‍द नहीं बन सकता जो इज्‍जत को भारत में छोड़कर गए और सिर्फ राष्‍ट्र को ऊंचा उठाने के लिए खत्‍म हो गए। पीछे सिवाय विचारों के कुछ नहीं। वैसे परमहंस ने भी पीछे कुछ नहीं छोड़ा सिवाय विचारों के… लेकिन माया के जाल से बचने का रामकृष्‍ण का तरीका मुझे अधिक श्रेष्‍ठ लगता है। जहां रैंचो खुद को सिस्‍टम से बड़़ा बना लेता है वहीं राजू उसी सिस्‍टम में अपनी पैठ बनाता है। अंगूठियां पहनकर और भगवान से भीख मांगकर पास होने वाला राजू जब कांफिडेंस में आता है तो सलेक्‍टर्स को कहता है आप अपनी नौकरी रखिए मैं अपना एटीट्यूट रखता हूं।

क्‍या हम भी ऐसा ही नहीं चाहते…

फरहान बनकर सपनों के पीछे ब्राजील के रेन फोरेस्‍ट में जाने का ख्‍वाब मेरा तो नहीं है

रैंचो की तरह लद्दाख में गुमनामी की जिंदगी भी नहीं जी सकता

हां राजू की तरह सिस्‍टम को सिस्‍टम के भीतर रहकर चैलेंज कर सकता हूं और अपने लिए बेहतर जगह बना सकता हूं…. बिना डरे…

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7 विचार “बहुत सोचा अब लिख रहा हूं&rdquo पर;

  1. पूरा विश्लेषण पसंद आया. परसों ही फिल्म देखी है, इसलिए समझ भी आया.इस फिल्म की यही खूबी है कि फिल्म देख लेने के बाद यह ऐसे मानसिक मंथन को जन्म देती है..दुनिया में रैंचों भी हैं, फरहान भी, राजू भी हैं और रामालिंगम उर्फ साईलेन्सर भी हैं.

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  2. काफी कुछ एक जैसी मानसीक हलचल. मैं रांचो की सोच रखता हूँ, जिनियस नहीं हूँ (शायद) इसलिए पढ़ाई छोड़ दी. और अब अपने निर्णयों को खूद ही समझने की कोशिश कर रहा हूँ.

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  3. आहा ….बिलकुल ऐसा ही मेरे एक सर्जन दोस्त ने फिल्म से बाहर निकल कर फोन पर मुझसे कहा था …दरअसल हम सब जानबूझ के अपने को खोते है ….फिर उसी गुमशुदा को याद करके रोते है ..

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  4. It seems like a shallow water dive for me.Do not write something because it is different from others.I have seen the movie..and what you are saying could be told in less words.As per movie it tells start thinking and believing in what ever do.For me it was old wine in new bottal but still it has its unique way of interaction with audience.Please thoda aur atm manthhan karain as you can always write better then this.

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  5. बेनामीजी अब आपने कहा है तो एक बार फिर मंथन करूंगा… अब तक तो वही लिखा जो समझ में आया… बाकी देखते हैं और क्‍या निष्‍कर्ष निकाल पाता हूं। जहां तक लिखने की बात है मैं अलग नहीं लिखना चाहता था बस वही लिखना चाहता हूं जो मेरे दिमाग में है। यहां खास बात यह थी कि मैं वह सोच रहा था जो दूसरे नहीं सोच रहे थे। आपने पढ़ा इसके लिए दिल से आभार…

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  6. sirexact good film review but more of us depands upon the reaction of society , relative ,friends etc.what he/she will think if i do /do not work like this way. even we can not cast a single vote with our indepandent thought.farhen was doing as per her parents planing and lastly he did as his heart allow for him.

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