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छद्म और अंध विश्‍वास में अंतर है

लवली कुमारी जी के ब्‍लॉग संचिका पर मैं अंधविश्‍वास के बारे में हैडिंग देखकर पढ़ने चला गया। विज्ञान की छात्रा लवली कुमारीजी की मेधा पर बहुत कम लोगों को शक होगा लेकिन इस बार उन्‍होंने ऐसा टॉपिक छेड़ा कि मैं न चाहते हुए भी उसमें कूद पड़ा। वहां चर्चा का सिलसिला अप्रिय तरीके से मैंने ही शुरू किया और अब उसे और बढ़ाना नहीं चाहता। लेकिन एक बात मन में है कि स्किजोफ्रीनिया के बारे में आम लोगों को आम भाषा में जानकारी क्‍यों न दी जाए। बस यह पोस्‍ट लिखने बैठ गया हूं। बात शुरू हुई अंधविश्‍वासियों से…

मानसिक अवस्‍था

स्किजोफ्रीनिया के रोगी अंधविश्‍वासी होते हैं वे न केवल ईश्‍वर को देखते हैं बल्कि उनसे वार्तालाप भी करते हैं और कई बार उनके आदेशों को मानकर बलि देने जैसे कामों को भी अंजाम दे देते हैं। भारत में एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी ने एक रात में लोहे की रॉड से सड़क के किनारे सो रहे इकतालीस लोगों की हत्‍या की और शांति से अपने घर में जाकर बैठ गया। पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय में उस रोगी के चेहरे पर असीम शांति थी। क्‍योंकि यह सब उसने सूर्य भगवान के निर्देश पर किया था। सूर्य भगवान रोज उससे बातें किया करते थे। यह रोगी दिल्‍ली की तिहाड़ जेल में है। पिछली जानकारी तक तो.. आज का पता नहीं।

खैर यहां डराने की नहीं बल्कि हकीकत तक पहुंचने की बात है। करीब दस साल पहले मैंने एक अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त साइकोलॉजिस्‍ट (अब उनका निधन हो चुका है) से इस बारे में पूछा था। तब उन्‍होंने जो समझाया आज तक समझने के स्‍तर पर उससे बेहतर और कोई जवाब मिला नहीं है। इस बारे में मैंने न्‍यूरोलॉजिस्‍ट से लेकर साइक्रेटिस्‍ट और अन्‍य साइकोलॉजिस्‍ट से भी बातें की लेकिन किसी के दिमाग में इसकी स्‍पष्‍ट तस्‍वीर नहीं है।

लक्षण: स्‍पष्‍ट तौर पर सिर्फ एक संदेह। हर किसी पर, हर परिस्थिति पर और हर कोण से। बाकी बातें बाद में आती हैं।

कैसे होता है: इसे साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कह सकते हैं। यानि शारीरिक क्षति का भुगतान मानसिक अवस्‍था करती है।

आम बोलचाल में: इसे समझिए कि दिमाग के दो हिस्‍से हैं। दांया और बायां। इन दोनों हिस्‍सों में या कह दें कि दिमाग में ऑक्‍सीजन पहुंचाने के लिए लाल रक्‍त कणिकाओं का इस्‍तेमाल नहीं होता। इसके लिए अलग से ऑक्‍सीजन कैरियर्स होते हैं। ये कैरियर दिमाग के पिछले हिस्‍से में जाकर ऑक्‍सीजन को आरबीसी से ले लेते हैं और फिर दिमाग के अलग-अलग हिस्‍सों में चलते जाते हैं। वहां ऑक्‍सीजन की सप्‍लाई हो जाती है। दिमाग के हर हिस्‍से के लिए कैरियर पहले से तय हैं। इनमें बदलाव नहीं होता।

अब चाहे किसी बाहरी चोट से, किसी मेंटल डिसऑर्डर से या वंशानुगत कारणों से ये ऑक्‍सीजन के वाहक बनना बंद हो जाते हैं। अब दिमाग का एक हिस्‍सा बिना ऑक्‍सीजन की अवस्‍था में आ जाता है। तो उस हिस्‍से के न्‍यूरॉन मरने के संदेश भेजने लगते हैं। इसे नीयर डेथ एक्‍सपीरियंसेज कहते हैं। मौत को बहुत करीब से देखने वाले बहुत से लोगों को चमक, भगवान और कई तरह की चीजें दिखाई देने लगती हैं। दायां मस्तिष्‍क इस कल्‍पना को जन्‍म देता है और बायां भाग उसे जस्टिफाई करता है। अब स्‍कीजोफ्रीनिया में अंतर यह होता है कि दिन के चौबीस घण्‍टे, सातों दिन और सालों तक यह प्रक्रिया चलती है। ऐसे में रोगी संदेह करने लगता है। हर तथ्‍य पर जो सामने आता है। इसी अवस्‍था में ईश्‍वर उसे एकमात्र सहायक के रूप में नजर आने लगते हैं और वह छद्म विश्‍वास बना लेता है कि ईश्‍वर उससे बात कर रहे हैं या ईश्‍वर उसके कांटेक्‍ट में है।

इन लोगों के केवल ईश्‍वर ही नहीं बल्कि अन्‍य ऐसी कई चीजों के प्रति छद्म विश्‍वास होता है जो आमतौर पर होती ही नहीं हैं। जैसे एक रोगी को लगता था कि उसके सामने रखे शीशे में दो ड्रेगन हैं, एक अन्‍य रोगी को दूसरों द्वारा की जा रही साजिश दीवार पर चित्रों के रूप में दिखाई देती है। एक अन्‍य दूसरों पर अनैतिक लांछन लगता है।

प्रभाव: इस सबका असर यह होता है कि रोगी के परिवार के लोग ही एक-दूसरे को गलत समझने लगते हैं और रोगी के रोग की वजह बताने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि रोगी और भी अकेला पड़ जाता है। वह खुद यह डिसाइड नहीं कर पाता है कि कौन उसके पक्ष में है और कौन विरोध में।

ईलाज: सालों पहले तक इस रोग के बारे में चिकित्‍सकों की स्‍पष्‍ट राय नहीं होने के कारण पहले रोगी को संदमित करने की दवाएं दी जाती रहीं बाद में इलेक्ट्रिक शॉक की सहायता भी लगी गई लेकिन ये रोगी अनपेक्षित रूप से कभी भी ठीक हो जाते हैं और कभी भी गड़बड़। अब साइको सोमेटिक डिसऑर्डर कब होगा और कब नहीं कोई नहीं कह सकता। ऐसे में रोगी का व्‍यवहार की उसके ईलाज में आड़े आता है। यानि कभी पूर्ण संयत होता तो भी पूर्ण मैनिक होना।

दवाएं: पिछले कुछ समय में कम संदमन करने वाली और ऑक्‍सीजन कैरियर की कमी की पूर्ति करने वाली दवाएं बाजार में आई हैं। इससे रोगियों को बहुत हद तक आराम भी मिला है।

अब मैं कह सकता हूं कि अंध विश्‍वास और छद्म विश्‍वास में अंतर है। उम्‍मीद है आप भी समझे होंगे….

अंत में: अगर आपको एक स्किजोफ्रीनिया के रोगी की सुपरफीशियल तस्‍वीर देखनी हो तो आप ए ब्‍यूटीफुल माइंड फिल्‍म देखिए। गेम थ्‍योरी विषय में नोबेल पुरस्‍कार प्राप्‍त कर चुके जॉन नैश ने इस रोग को पूरे जीवन भोगा है और अब उनका पुत्र भी इसी बीमारी से ग्रस्‍त है।

जिस प्‍वाइंट को लेकर मेरे दिमाग में यह हलचल शुरू हुई वह लवली कुमारीजी की पोस्‍ट अन्धविश्वाशी लोगों में पाया जाने वाला सामान्य रोग – स्किजोफ्रेनिया थी।

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छद्म और अंध विश्‍वास में अंतर है&rdquo पर एक विचार;

  1. काफी काम की जानकारी दे गये…ए ब्‍यूटीफुल माइंड फिल्म देखी जायेगी.

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  2. स्कीजोफ्रीनिया से सम्बंधित महत्वपूर्ण जानकारी मिली …अब इसपर अंधविश्वास करे या छद्म विश्वास …शक हो रहा है …भाग लू …इससे पहले की कोई इस बीमारी का मरीज :)मान ले..

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  3. विज्ञान की छात्रा लवली कुमारीजी की मेधा पर बहुत कम लोगों को शक होगा.. :-)लीपापोती की दरकार नही है सिद्धार्थ जी. कई बार हम समझने में गलतियाँ कर जाते हैं.कई बार स्थितियां शंदेहपूर्ण होती है. जैसा की मुझे लगता है, आपने उस पोस्ट के पहले मुझे कभी नही पढ़ा होगा इस कारन आपको गलतफहमी हो गई. स्पस्ट कर दूँ मेरा विषय अन्धविश्वाश और उससे जुड़े मनोरोगों पर चर्चा करना था, जो मैंने हर बार स्पस्ट लिखा है. फिर भी आपकी दृष्टि में जो स्पस्ट हुआ वह आपने कहा. मुझे इससे कोई समस्या नही है. होनी भी नही चाहिए अगर मैं खुद को आपकी जगह रख कर देखूं तब. अच्छा लगा की आपने चर्चा यहाँ आगे बधाई. स्किजोफ्रीनिया पर लिखते वक्त उसके एक लक्षन हलुसिनेशन पर भी चर्चा की आवश्यकता थी कर देते तब बढ़िया होता. शेष फिर चर्चा जारी रहेगी ..स्वागत है.

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  4. एक अनुरोध था, उस पोस्ट का लिंक दे देते ..तब जरा जनता को आसानी होती, मेरी योग्यता /अयोग्यता पर निष्कर्ष निकालने में. सादरलवली

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  5. सिद्धार्थ जी,मैने इस लेख के कुछ अँश हिन्दी वीकीपीडीया पर डाल दिये है और आपके इस लेख का लिन्क दिया है|

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  6. एक अच्छी बात यह है कि यह विश्लेषण आपने बिलकुल सरल भाषा में रखा है। नही ंतो एक गंभीर, अनजाना विषय ऊपर से क्लिष्ट भाषा शैली। दूर-दराज गांव में बैठा अनपढ़ जैसा आदमी उसे क्यों तो पढ़ेगा और क्यों समझने की कोशिश करेगा ? उसे भी छोड़िए, मैंने तो ऐसे-ऐसे डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, आफीसर आदि-आदि देखें हैं जो मनोचिकित्सक का नाम सुनते ही ऐसी प्रतिक्रिया करते हैं जैसे सुनामी आ गयी हो। भले रोगी के साथ एक-एक कर पूरा परिवार नष्ट हो जाए, वे बाबाओं और ओझाओं से आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते। ऐसे सभी छोटे-बड़े प्रयास एक दिन सार्थक होंगे।

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  7. आपने यह सही कहा आपका संचिका पर अपनाया तरीका अप्रिय था।यह तरीका ज़्यादा सही है, यदि हमें लगता है कि विषय को कहीं भी सही तरीके से नहीं उठाया गया है, तो उसे अपने यहां विस्तार दिया जा सकता है।आखिर हमारा उद्देश्य विषय प्रवर्तन ही है, ना कि व्यक्तिगत आक्षेपण।आपने काफ़ी तार्किक दृष्टिकोण और सरोकारों के साथ यहां उसी बात को अच्छा विस्तार दिया है, और बखूबी दिया है।हालांकि आप अंधविश्वास और छ्द्मविश्वास के जरिए क्या समझाना चाह रहे हैं, यह इस नाचीज़ को स्पष्ट नहीं हुआ। ड़ोर और उलझा दी सी लगी।शायद आप कहना चाह रहे हैं कि अंधविश्वास छद्म नहीं होता। राहें थोड़ा सा अलग भले ही लगती हो, पर मंज़िल तो लगभग एक ही सी हैं। कोई ईश्वर को सत्य मानकर उस पर अंधविश्वास करे, या ईश्वर पर छद्म विश्वास करे, ज़्यादा अंतर सा नहीं लगता। कटना तो खरबूजे को ही है।या हो सकता है, आपका मतलब कुछ और रहा हो।पर इस प्रविष्टि पर आपके सरोकार बहुत स्पष्ट हैं, दृष्टिकोण वैज्ञानिक। वाकई अच्छा लगा।शुक्रिया

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  8. सिद्धार्थ जी, आप ने बहुत सुंदर बात बताई, मेने अनपढ ही नही पढे लिखे डाकटर लोगो को भी देखा है ऎसे कृत करते हुये, शायद वो भी ऎसी ही बिमारी के शिकार हो.धन्यवाद

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  9. प्रिय सिद्धार्थ जी , सिजोफ्रेनिया के बाबत काफी महत्त्वपूर्ण जानकारी दी आपने और बड़े जतन से पाठको को लाभान्वित करना चाहा है आपने / मैंने कही पढ़ा था परन्तु यदि मै गलत ना हूँ तो पुरे 80 किस्म के मानसिक रोगों में से एक रोग सिजोफ्रेनिया भी आता है / निश्चय ही इसके रोगी सहयोग के अधिकारी होते है / एक ज्योतिषी होने के कारण मुझे कई रोगी देखने को मिले जो भूत प्रेत की गफलत में सिजोफ्रेनिया के शिकार थे मैंने बड़ी शाईस्त्गी से उनेह रोग मुक्ति के लिए डॉक्टर से इलाज की राह सुझाई / बड़ी ख़ुशी है की आप इस मामले में लोगबाग को अच्छी जानकारी बाँट रहे है / आपके अन्या ब्लोगों का अध्यन कर रहा हूँ क्रमवार मुलाकाते होंगी /थैंक्स/

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  10. आपने इस मानसिक रोग पर लिखने के लिए कलम उठाई उसके लिए अति धन्यवाद! दरअसल मैं यहाँ तक पहुंचा इस रोग के बारे में हिन्दी के कुछ लेख पढ़ने के लिए। सिद्धार्थ जी मेरी इकलौती बहन जो हम तीन भाइयों में सबसे छोटी है उसे 'स्किजोफ्रीनिया' है, ऐसा मनोचिकित्‍सकों कि राय है। अब मेरी समझ में नहीं आता की मैं क्या करूँ? मेरी मनोदशा को समझते हुए अगर आप कोई उपाय बता सकते हों तो मुझे हिन्दी/रोमन में मेल कर सकते हैं। मेरा ई-मेल है— dharmendra61@gmail.com

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