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राहत की बात – मैं अकेला नहीं हूं :)

अभी सुरेश चिपलूनकर जी  टिप्पणी सम्बन्धी खुराफ़ात के बारे में बता रहे थे तब पहली बार लगा कि मैं अकेला नहीं हूं। इस कारण नहीं कि वे ज्‍योतिष और वास्‍तु जैसी विधाओं को कोसते रहे हैं। इस विषय पर तो मैंने उनका विरोध किया है। लेकिन उनकी कविता नहीं समझ पाने की स्थिति ने मुझे काफी राहत दी है। अब तक ऐसा लगता था कि दुनिया के अधिकांश पढ़ने लिखने वाले लोग गद्य के अलावा पद्य को आसानी से समझ लेते हैं और सृजन भी कर लेते हैं। इस पोस्‍ट में उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा है कि उन्‍हें कविता समझ में नहीं आती। दरअसल मुझे भी नहीं आती। 🙂

इसके बावजूद नेट पर रोजाना पचासों कविताएं नई आती हैं। मौलिक और गहरी। कईयों के तो शब्‍द और वाक्‍य संरचना तक दिमाग के एंटीना को भी छू नहीं पाते। खैर मुझे लगता है मेरे और सुरेश जी के अलावा जहां में और भी होंगे जो सुखनवर न बन पाए हों। वैसे गद्य लिखकर भी मैं भारतेंदु हरिश्‍चंद्र की परम्‍परा को ही आगे बढ़ा रहा हूं। उन्‍होंने पद्य में अतुकांत का समावेश किया और फिर अभिव्‍यक्ति के क्षेत्र में गद्य को प्रभावी तरीके से शामिल कर दिया। मैं अपने मन की बात सहज होकर कह पा रहा हूं। तब शायद पद्य की इतनी आवश्‍यकता भी नहीं है।

फिर भी उड़न तश्तरी …. को देखता हूं तो कर्मकाण्‍ड की एक बात याद आ जाती है जिसमें बताया गया है कि सरस्‍वती की बीजमंत्र के साथ आराधना करने पर कवित्‍व शक्ति अर्जित की जा सकती है। समीरजी न केवल गद्य में अपनी बात रोचक और गहराई के साथ व्‍यक्‍त करते है और पद्य भी सहज रच लेते हैं। यह मुझमे ईर्ष्‍या भाव जगा देता है।

(मैं यहां द्वेष नहीं कह रहा :))

इसी तरह अनुराग आर्य जी के दिल की बात ही ले लीजिए। वे अपनी बात गद्य के छोटे बड़े टुकड़ों में करते हैं और आखिर में पद्य की तीन या चार लाइने इतनी प्रभावी होती हैं कि पोस्‍ट के नीचे के कमेंट्स में गद्य से अधिक पद्य तालियां बटोरता नजर आता है। यही स्थिति चिट्ठा चर्चा की भी है। अनूपजी पूरी पोस्‍ट लिखने के बाद आखिर में एक लाइना लिखते हैं। यह एक ओर गद्य होता है तो दूसरी ओर लाइन को पूरा करने के चक्‍कर में पद्य जैसा बन जाता है। यह इतनी रोचक होती है कि मैं पूरी पोस्‍ट छोड़कर पहले एक लाइना पर जाता हूं। वहां कुछ दम दिखाई देता है तो बाकी की पोस्‍ट भी पढ़ लेता हूं वरना आगे रवाना। अनूपजी ने कुछ पोस्‍टें तो पूरी ही एक लाइना लिखी हैं। गद्य और पद्य का यह मिलन किसी चिठ्ठा चर्चा में ही हो सकता है। जहां बात समझ नहीं आने पर लिंक पर चटका लगाओ और पहुंच जाओ माजरा समझने के लिए 🙂

अब सोच रहा हूं कि ऐं, वद् वद् वाग्‍वादिनी के सवा लाख जप करके कवित्‍व शक्ति प्राप्‍त कर ही लेनी चाहिए। लेकिन हमारे यहां कहा जाता है धिके जित्‍ते धिकन्‍दे यानि जब तक चलता रह सकता है चलने दो। ठीक है गद्य ही सही… 🙂

 

आखिर में बात लिंक रोड की। जयपुर के राजीव जैन जी ने एक नया ब्‍लॉग शुरू किया है। यहां वे क्‍लासिफिकेशन के आधार पर ब्‍लॉग्‍स जमा रहे हैं। इसमें बीकानेर के ब्‍लॉग में मेरे ब्‍लॉग का पता भी है। इसके अलावा कार्टूनिस्‍टों के ब्‍लॉग, हास्‍य व्‍यंग, लेखकों, तकनीकी आदि ब्‍लॉगों के बारे जानकारी दे रहे हैं। फिलहाल बहुत कम ब्‍लॉग इनकी लिस्‍ट में है लेकिन यह लगातार बढ़ता रहा तो एक दिन रेफरल चिठ्ठा बन जाएगा। राजीव जी को शुभकामनाएं।

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2 विचार “राहत की बात – मैं अकेला नहीं हूं :)&rdquo पर;

  1. Mujhe hindi me likha hua paste nahi karne de raha, so roman me likh raha hoon.Aap jo likhte hain wah bhee achchha hai. Mujhse kahanee ya lekh nahee bante, pata nahee sidhdhi se madad milegee…agar aap safal ho jayen to avashya batayen..main bhee aajmaoonga..

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  2. सिद्धार्थ भाई, अब भला इसमें शरमाना कैसा? मैंने और आपने तो बता दिया कि हमें कविता नामक चीज की कोई समझ नहीं है। लेकिन आज भी नेट और ब्लॉग जगत में ऐसे-ऐसे धुरन्धर मिल जायेंगे जो अपने आपको निराला-महादेवी से कम नहीं समझते और कविताओं सम्बन्धी ब्लॉग पर टिप्पणियाँ पेलते रहते हैं…। आपने इस मुद्दे पर मेरा साथ दिया इसलिये धन्यवाद, और लोग भी आते ही होंगे, जो अब तक ये बताने में शरमा रहे थे।

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  3. प्रिय सिद्धार्थ ….बस जो दिल को अच्छा लगे वो जम जाता है ..कविता के शिल्प ओर नियम तो हमें नहीं मालूम….अब देखो…पीयूष मिश्रा ने गुलाल में क्या लाइने लिखी है …….मजाजो के उन इन्कलाबो की दुनिया फैजो फिराको ,साहिर ,उमर ख्यालो ,मीर कीजोके ,किताबो की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है .उजडे हुए चंद बासी ख्यालो की दुनिया तुम्हारी है तुम्ही संभालो ये दुनिया ….बस भा गयी….वैसे हमें इमोशनल अत्याचार ओर परदेसी भी भाया था ….पता नहीं कवि लोग उसे किसी केटगरी में रखे ….

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  4. तीन वर्ष पहले तो मैं भी गद्य से भागती थी। कविता शायद लिखी नहीं जातीं अपने आप को स्वयं लिखवा लेती हैं।घुघूती बासूती

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  5. भईया कविता तो हमे भी समझ क्या, पले ही नही पडती लेकिन तारीफ़ हम जरुर करते है, अगर हमारी तारीफ़ से उन को होस्सला मिलता हो तो बुराई क्या, जेसे जब आखाडॆ मै दो पहलवान लडते है ओर देखने वाले सभी पहलवान तो नही होते लेकिन हिम्मत तो उन देखने वालो की वाह वाह से भी मिलती ही होगी.राम राम जी की.. मुझे शिकायत है पराया देश छोटी छोटी बातें नन्हे मुन्हे

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  6. कवियॊ की इतनी तौहीन बर्दाश्त से बाहर है अगर कविता समझ ना आए तो भी वाह वाह किजिए। देखा नही हम जैसे बहुत से ब्लोगर तो गध और पध दोनों जगह भ्रमण करते रहते हैं।;))अब हम क्या करें कविता अपने आप लिखी जाती है तो…..अब समझ आया कि आप की और सुरेश जी की टिप्पणीयां कवियों को क्यों नही मिल रही..;))बहुत बढिया व स्पस्ट लिखने के लिए बधाई।

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  7. इस सादगी और विनम्रता के सदके जांवा! मैं तो ये कहूँगा जो समझ नहीं आये वो कविता ही नहीं है. हमारे यहाँ कई लोग कविता के नाम पर 'माया' रचते है. भारी भरकम शब्दों के अभेद्य किले! गगन गिल से एक बार लम्बा साक्षात्कार करने का मौका मिला था,उनका कहना था कि कविता ही बहुत सारी जटिल स्थितियों को बेहद कम शब्दों में भी व्यक्त कर पाती है.मुझे लगता है मैं भी कुछ सरल,जीवन की बिलकुल आम- रोज़मर्रा की चीज़ों से जुडी कविता को ही समझ पाने की कोशिश कर पाता हूँ.

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  8. जय हो महाराज..बचपन से दिल करता था कि भविष्य बताना सीख लूँ, आज तक न कर पाये.बस, यही हमारे लिए आपसे ईर्ष्या का विषय है तो आपस में कट पिट. अब बराबरी का चाल-साफ स्लेट पर.बहुत आभार यह सम्मान देने के लिए.अनेक शुभकामनाऐं.

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  9. समझदारों से अटी पड़ी इस दुनिया में कम रचनात्मक इंसानों को भी अपने आप को अभिव्यक्त करने का पूरा पूरा अधिकार है…चाहे वो साधारण कविता के रूप में हो या कमेंट्स के रूप में …आप सहमत नहीं हैं ..??

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  10. वाणी जी जानना चाहूँगा कि आपने गद्य या पद्य कौन सी विधा में अक्षम व्यक्ति की रचनात्मकता को कम समझा.

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  11. @ वाणी जी आप कविताएं लिख लेती हैं। मैं उन्‍हें जज तो नहीं कर सकता लेकिन जैसा कि मैं पोस्‍ट में बता चुका हूं कि इसे सरस्‍वती का आशीर्वाद कहा जाता है। तो कम या अधिक रचनात्‍मकता की बात शायद बाकी नहीं बचती। मैं सोचता हूं कि रचनात्‍मकता या तो होती है या नहीं होती। आपकी लय से मैच करने वाले लोगों के लिए आपकी रचनाओं से बेहतरीन और कुछ नहीं हो सकता।

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  12. padhkar main kuch ulajh sa gaya hu, ki yadi aap jaise lekhakgan hi kavita ke marm ko nahin samjhenge to is ram rajya ki sukhi janta se to hum apeksha hi kya rakh sakte hain? waise pahli bar apka blog padhne ka muka mila or kafi rochak laga atev iska link bhejne ke liye sadhuwad.

    aapka
    shashank shekhar joshi (sadharan)

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  13. हर विधा का अपना अंदाज है, अपनी समझ है और अपने फैन हैं।

    अब जिस चीज की समझ नहीं है, उस पर टिप्‍पणी करने से अच्‍छा है कि ईमानदारी से मान ही लिया जाए कि कविता समझ नहीं आती… 🙂

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