economy · new thought · s. gurumurthy · sidharth joshi · women

सरजमीने हिन्‍द की औरतों…

आज मैं कह सकता हूं, सरजमीने हिंद की औरतों, तुम्हें सलाम।
ऐसा क्यों । इसका एक मोटा कारण है।

रविवार को मैं जयपुर में था। मौका था राजस्थान पत्रिका के पत्रकारिता पुरस्कारों का। बैस्ट कवरेज कैटेगरी में मेरी टीम को राष्ट्रीय स्‍तर पर तीसरा पुरस्कार मिला था। पुरस्कार लेने के बाद हमें अतिरिक्त पुरस्कार के रूप में मिला स्वामीनाथन गुरूमूर्ति का भाषण। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय इकॉनोमी पर स्वामीनाथन के भाषण ने जैसे हमारी (मेरी) आंखें खोल दी।

उन्होंने फैमिली सिस्टम के आधार पर अमरीकी उपभोक्तावाद और बचत के प्रारूप को विस्तार से बताया। आंकड़ों के साथ सिद्ध किया कि अमरीका का इकॉनोमिक डाउनफॉल 80 के दशक में ही शुरू हो चुका था। इसके बाद का काल तो ऐसा था कि अमरीकी लोगों के लिए खर्च करने के लिए जेब भरी होने की जरूरत ही नहीं थी। यानि उधार लो और खर्च कर दो। अब अमरीकी लोगों ने बाजार से पैसा लिया और घूमने फिरने जैसे उपभोग में उसे खर्च कर दिया। चूंकि उनका पैसा और पैसा पैदा नहीं कर रहा था इसलिए रीपेमेंट की स्थितियां बाकी नहीं बची। ऐसे में अमरीकी उपभोक्‍तावाद पूरी तरह उधार लो और खर्च कर दो पर आ गया। अमरीका को सुपर पावर मानने वाले देश उसे ही ऋण देकर पैसे वाला बना रहे थे। आने वाले पैसे का उपभोग अमरीकी करते रहे। एक दिन बिना बचत वाला यह गुब्‍बारा फूट गया।

कुल मिलाकर समझा जाए तो किसी भी देश की अर्थव्‍यवस्‍था आम आदमी की बचत पर निर्भर करती है। और इसी आम आदमी द्वारा खर्च को बढ़ावा दिए जाने पर अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। जिन देशों को अधिक उपभोक्ताओं की जरूरत थी उन्होंने टारगेटेड देश की औरतों को इस प्रकार शिक्षित किया कि वे औरतें घोंसला संभालने वाली चिडि़या की बजाय आदमी का ही दूसरा रूप बन गई और जमकर खरीदारी और निवेश करने लगीं। ऐसे देश तेजी से उपभोक्ता वादी संस्‍कृति के‍ शिकार हुए। इसके विपरीत जापान में न तो पुरुषों में ना ही स्त्रियों में बचत को निकालकर निवेश या खर्च की प्रवृत्ति है। इस कारण बाजार को गति देने के प्रयास के मद्देनजर जब जापान में बचत पर ब्याज को कम किया गया उसके बावजूद वहां बचत की प्रवृत्ति में कोई बदलाव नहीं हुआ।

अब बात करते हैं भारत की

भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़े दो दशक हो रहे हैं। इस दौरान ब्याज की दरों में कमी, शेयर बाजार की तेजी, निवेश के आसान रास्ते और खर्च प्रोत्सातहित करने के लिए अनगिनत स्कीमें लोगों के सामने पेश की गई। इतना सबकुछ होने के बाद जहां भारतीय पुरुष आम पुरुषों की तरह खर्च और निवेश पर ध्यान देने लगे, वहीं भारतीय स्त्रियां अब भी जरूरत की चीजों में ही खर्च कर रही हैं। यानि एक स्‍त्री जब कोई चीज खरीदती है तो उसका मूल कारण यही होता है कि क्‍या इस उत्‍पाद की अभी घर में जरूरत है। इस वजह से जहां कुल जीडीपी का महज दो प्रतिशत शेयर बाजार में है वहीं बचत का प्रतिशत आज भी बहुत ऊँचा बना हुआ है। यह भारतीय स्त्रियों के कारण ही हो सका। धन्य है मेरे देश की स्त्रियां जिनके कारण वैश्विक मंदी के बावजूद आम भारतीय परिवार मंदी की मार से बचा हुआ है। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो बिना शोर शराबे और बिना क्रांति का गीत गाए पारम्परिक भारतीय औरत ने बिना पुरुषों को गाली निकाले देश को बचा लिया। सही कहूं तो वे अपने योगदान से अंजान अब भी समाज और अर्थव्यंवस्था की धुरी बनी हुई हैं।

इस लेख में स्‍वामीनाथन गुरूमूर्ति से सुने गए शब्द और कुछ मेरे विचारों का घालेमल हो गया है। उम्मीद है लोग पसंद करेंगे।

Advertisements

3 विचार “सरजमीने हिन्‍द की औरतों…&rdquo पर;

  1. यह सही है कि भारत में अभी भी बचत खर्च से ज्यादा है और इसका श्रेय महिलाओं को जाता है. आज पैसा कमाने वाली महिलाओं की संख्या बढती जा रही है. घर में ज्यादा पैसा आने लगा है. इस के बाबजूद महिलायें खर्च कम और बचा ज्यादा कर रही हैं. यह बचत हमारी अर्थ व्यवस्था को एक मजबूत आधार प्रदान करती है. बचपन में एक कहावत पढ़ी थी – उतने पैर फैलाओ जितनी बड़ी चादर हो’. हम भारतीयों को इसे हमेशा याद रखना चाहिए.

    Like

  2. yah hamara bhartiy culture hai jis mein har ghar mein hamen sikhaya hai ki ghar kaise chalaaya jaaata hai..aur khaas kar striyon ko ki paise kaise bachaye jaaatey hain..economically kaise istmaal kiye jaatey hain..Suresh chandra ji ki bat se poori tarah sahmat hun.yahi aaj aap ke is lekh likhne ka karan bhi ban gayee hai..abhaar sahit

    Like

  3. Sidharth ji. aap sahi kah rahe hai. Jab mere paas Rs nahi hote to pata nahi wo kanha se hajaro Rs nikal lati hai. Hindustan ki Orat hi bachat kar sakti hai.

    Like

टिप्पणियाँ बंद कर दी गयी है.