new thought · sidharth joshi

स्‍वतंत्रता की संभावना… भाग चार

आत्मा की स्वतंत्रता की बात से पहले बात आती है मानसिक स्वतंत्रता की। जब तक मनुष् इस दृष्टिकोण से सोचना शुरू नहीं करता कि स्वतंत्र होने की आवश्यकता भी है तब तक स्वतंत्रता की अन् संभावनाओं पर विचार करना व्यर्थ प्रतीत होता है। मोटीवेशनल मेनेजमेंट गुरुओं की सुनें तो लगता है जैसे कि आम आदमी के लिए बनाए गए अधिकांश निय व्यक्ति को सीमाओं में बांध देते हैं और इसी से स्वतंत्र होने की संभावनाएं खत् होने लगती है। इसकी परिणिती यह होती है कि व्यक्ति खुद को बंधनों में जकडा हुआ पाता है और कभी स्वतंत्र नहीं होता है। लेकिन विवेकानन् और रामकृष् परमहंस को देखा जाए तो मानसिक बंधनों की क्षुद्रता समझ आने लगती है। एक ओर परमहंस हैं जो कि कीचड के बीच भी श्वेत धवल नजर आते हैं। सांसारिकता में इतने सूक्ष् की मूर्ति से इतना प्यार कर बैठे कि उसे जीवंत कर दिया। माया के जाल में इतने सूक्ष् हो गए कि जाल का तानाबाना उन्हें जकड नहीं पाया। अपनी पत्नी को ही मां का दर्जा दे दिया। दूसरी ओर हैं विवेकानन्, उन्हीं परमहंस के शिष्य। माया के जाल के हर टुकडे से दूर। सांसारिकता त्यागने के बाद भी उन्हें चैन नहीं आया तो अपनी मातृभूमि त्याग दी और हर संबंध को खुद से दूर रखा। यानि अपना कद इतना विशाल कर लिया कि माया का जाल छोटा पड गया। केवल भारतीय और अमरीकी ही नहीं दुनिया का हर मनुष् उनके लिए भाई या बहन बन गए। तो जीवन बंधनों से बंधा हुआ होकर भी इतना सूक्ष् हो सकता है कि माया का आवरण बांध सके और इतना विशाल भी कि आवरण ही छोटा पड जाए। यानि स्वतंत्रता के लिए पहली शर्त है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकला जाए। यहां दूसरी खोज शुरू होती है कि मानसिक गुलामी से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?
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