अनुशासन हलवा सफलता विश्‍वास · new thought · sidharth joshi

अनुशासन और कुछ भी चलता है

हिटलर बहुत कडे अनुशासन में रहता था और पूरी जिन्‍दगी उसने बहुत सलीके और ध्‍यान से काटी। हद तो यह थी कि बहुत पहले ही उसने मीन कैम्‍फ नाम से अपने जीवन का एक नक्‍शा तैयार किया और लगातार उस पर चलता रहा। छोटा सा कद बुलंद हौंसले और उन्‍हें पूरा करने के लिए भयंकर अनुशासन। ओशो ने एक जगह लिखा कि क्‍या होता कि अगर हिटलर कुछ संगीत सुन लेता, कुछ नृतय कर लेता और कुछ समय छुट्टियां मना लेता। मैंने इन शब्‍दों को पढा तो एक बार लगा कि ओशो सही कह रहे हैं लेकिन भाग्‍य या दुर्भाग्‍य उन्‍हीं दिनों में मुझे अनुशासन का पाठ पढाया जा रहा था।
बहुत कुछ खो देने के विश्‍वास के साथ मैं भी एक सैट फारमेट में अनुशासन की सीख ले रहा था। तब मुझे महसूस हुआ कि कुछ हासिल करना है तो अनुशासन बहुत जरूरी है। यह भी तब आता है जब सत्‍य हो। सत्‍यता के साथ समझौता कर लोग अनुशासन में ढील लेते हैं और परिणाम में असफलता हाथ लगती है। यह कुछ कुछ दाल के हलवा बनाने जैसा काम है। दाल का हलवा बनाते समय हम पिसी हुई दाल को सेंकना शुरू करते हैं तो खुशबू आने तक सेंकते रहते है पूरे अनुशासन के साथ, इसके बाद घी डालते समय पूरी ईमानदारी बरतते हैं और जब तक हलवा तैयार नहीं हो जाता तब तक उसे चम्‍मच से बिना थके बिना रुके हिलाते रहते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी थोडी भी ढिलाई रहे तो…
दाल कच्‍ची रह जाएगी
घी की कमी से हलवा सूखा सूखा बनेगा
या फिर अधिक फीका या अधिक मीठा
यानि दाल का हलवा बिल्‍कुल सही बनाना हो तो पूरा अनुशासन और पूरी ईमानदारी चाहिए। बिना मिलावट
यही कुछ सफलता के साथ भी है।

सोचो अगर दाल का हलवा बनाते समय यह सोच दिमाग में हो कि सब कुछ चलता है…

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अनुशासन और कुछ भी चलता है&rdquo पर एक विचार;

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