new thought · sidharth joshi

तार्किक शिक्षा की जरूरत

शिक्षा कैसी हो इस बारे में बहुत कम दार्शनिकों ने विचार व्‍यक्‍त किए हैं। यह बात अलग है किन इन दार्शनिकों ने परम्‍परागत शिक्षा ग्रहण नहीं की। आधुनिक भारत में जहां कुछ पिछडे हुए लोगों को उठाने के लिए आरक्षण की व्‍यवस्‍था की गई है वहीं अगडों में से भी अधिकांश के पास नौकरी और सुरक्षित भविष्‍य नहीं है।
राष्‍ट्रवादी संगठनों ने मैकाले को गाली दी और अपनी जिम्‍मेदारी से मुक्ति पा ली। कुछ संगठन और मिशनरीज स्‍कूलें भी चला रहे हैं ताकि बचपन में ही बच्‍चों को धर्म विशेष का बीज पकडा दिया जाए। ताकि बडे होकर वे सफेद, लाल, गेरूए या हरे वस्‍त्र पहनकर धर्मयुद्ध में कूद सकें।
फिर भी आज एक पिता को इस बात की चिंता रहती है कि उसके पुत्र का भविष्‍य क्‍या होगा। क्‍या वह अपने पैरों पर खडा हो पाएगा, क्‍या वह वायोलेंट होते समाज में अपने पैर जमा पाएगा, क्‍या वह प्रतिस्‍पर्द्धा में टिक पाएगा। उसे क्‍या बताया जाए कि वह सबसे आगे रहे। अक्षर ज्ञान प्राप्‍त कर चुके लोगों को भी यह पता नहीं कि अपने अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए या फिर आज की हमारी नैतिक जिम्‍मेदारी क्‍या है
किसी बच्‍चे को तार्किक और स्‍पष्‍ट सोच के लिए न केवल पढाई की बल्कि तर्कपूर्ण वातावरण की भी आवश्‍यकता होती है।
अगले पोस्‍ट में मैं बात करुंगा ओशो के नजरिए की।

Advertisements