new thought · sidharth joshi

ओशो का नजरिया

सामान्‍य शिक्षा

दीक्षा की आलोचना करने वाले ओशो ने एक ही बात पर बल दिया कि शिक्षा ऐसी हो जो मनुष्‍य को सोचना सिखाए। जब तक मनुष्‍य खुद सोचना नहीं सीखेगा और दूसरे की सोच पर काम करेगा तब तक दुख पाएगा। ऐसे में किसी विद्यार्थी को गुरू क्‍या सिखा सकता है। इस बारे में ओशो कहते हैं कि सिखाओ मत देखो कि विद्यार्थी क्‍या सीखने को प्रवृत्‍त है। जैसा विद्यार्थी का रुझान हो शिक्षक को बडे भाई की तरह उसका मार्गदर्शन करना चाहिए। न कि बाप की तरह। ऐसे में सीखने के दौरान आने वाली बाधाओं को पार करने के अलावा अतिरिक्‍त स्‍वतंत्रता की संभावना बनी रहेगी जो विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास में सहायक होगी। ऐसा नहीं होने पर सिस्‍टम में पहले से तैयार हो रहे लोगों जैसा ही एक और मनुष्‍य आ खडा होगा। जो व्‍यवस्‍था से सांमजस्‍य बनाकर चलता हो और जीवनयापन करता हो।
गुरू की भूमिका के बारे में ओशो स्‍पष्‍ट करते हैं कि मारने या अन्‍य विधियों से भ्‍ाय पैदा करने से अगर चेला गुरू का कहना मानता है तो इसका कोई फायदा नहीं है। गुरू ऐसा होना चाहिए जिसके प्रति चेले के मन में स्‍वयं ही आदर पैदा हो। और ऐसा केवल प्रेम अनुराग से ही संभव है।

Advertisements