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कैसे समझाएं गाय हमारी माता है…

गाय हमारी माता है, आज से नहीं, सदियों से हमारी माता है, फिर कुछ सनातनियों का जबरन धर्म परिवर्तन करा दिया गया, गाय उनकी माता नहीं रही। कुछ इस्‍लाम में चले गए, कुछ क्रिश्चियन बन गए, उनके लिए गाय माता नहीं रही। हां, मूर्खतापूर्ण कुतर्कों के लिए अर्थव्‍यवस्‍था की धुरी बनी रही, इस कारण गाय को माता का दर्जा मिला रहा, लेकिन उसके धार्मिक और आध्‍यात्मिक पक्ष दरकिनार हो गए।

कालांतर में दूध का सेवन स्‍वास्‍थ्‍य का मुद्दा बन गया, सो गाय और भैंस को शहरी क्षेत्रों में एक बराबर खड़ा कर दिया गया। फिर गाय का मांस अधिक पौष्ठिक और अधिक सुगंधित हो गया।

अब सनातनी के लिए गाय अपने पूरे वजूद के साथ मौजूद है, उसके जीवन की बड़ा भाग है, गौ घृत को दिव्‍य और दूध को अमृत मानता है, लेकिन दूसरे पक्ष के लिए बकरी का दूध और ऊंट का मूत्र, या कहें चर्च धोकर हासिल किया गया दिव्‍य जल अधिक महत्‍वपूर्ण है।

गौकशी पर जब सनातनी बिलबिलाता है, तो दूसरा पक्ष कहता है, दूध, घी और मांस के उपयुक्‍त इस पशु को लेकर इतनी झांय झांय क्‍यों ??

कैसे समझाएं गाय हमारी माता है…


कृष्‍ण गायों के साथ बांसुरी बजाते दिखाई देते हैं, लेकिन सांडों के साथ लड़ते हुए। अगर केवल अर्थव्‍यवस्‍था का ही भाग होने के कारण गाय माता होती तो बकरी मौसी और भैंस बुआ होती…

अकल पर पत्‍थर पड़े हों तो लॉजिक भी शूल सा लगता है। केवल बीबी बच्‍चों का पेट भरने की जुगत में ही उम्र निकली जा रही हो तो आध्‍यात्मिक बातें बेकार का प्रवचन महसूस होती है, ऐसे में कैसे समझाएं कि गाय हमारी माता है…


कुछ लोगों को यह लॉजिक बहुत अपीलिंग लगता है कि चूंकि गाय कचरे के ढेर पर घूम रही है, पॉलीथिन खा रही है, गलियों में कचरा खाते घूम रही है, इसलिए उसे कसाईवाड़े के सुपुर्द कर दिया जाना चाहिए, लावारिस घूमते बच्‍चों और मेले में खो गई औरतों के बारे में भी क्‍या यही ख्‍याल करते होंगे…

गाय हमारी माता है…
सांड हमारा बाप नहीं है…


अब कैसे बताएं कि गाय हमारी माता है, लेकिन सांड हमारा बाप नहीं है, जो लोग गौ हत्‍या को जबरन सांड पालन से जोड़ते हैं, उनके लिए मेंटल एसाइलम की जरूरत है, जो दिमाग के लॉजिक वाले हिस्‍से की मरम्‍मत करे…

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तुमने उसे समस्‍या बनाया

वो कभी समस्‍या नहीं थी, तुमने उसे समस्‍या बनाया

गाय को पहले तो आर्थिक पशु घोषित किया गया, उसके दूध से दूधो नहाओ पूतो फलो करते रहे, लेकिन जब उसी गाय ने दूध देना बंद कर दिया तो उसे समस्‍या का हिस्‍सा घोषित कर दिया। वास्‍तव में गाय पहले कभी समस्‍या का हिस्‍सा नहीं थी। जब मां थी, तब भी टलती थी, आज भी टलती है, यानी दूध देना बंद करती है।

पहले उन लोगों को पता था कि गाय के लिए गोचर भूमि की जरूरत होगी, सो जितना शहर बसा होता, कई बार उससे भी अधिक क्षेत्र गोचर भूमि के लिए छोड़ दिया जाता, लेकिन शहरी बसावट बढ़ते बढ़ते आखिर गोचर का अतिक्रमण करती और पशुओं के लिए दूर दराज से चारा खरीदा जाने लगा। अब डीजल पर चढ़कर चारा आएगा तो गोचर की तुलना में हर कोण से महंगा ही होगा।

यह महंगा चारा, दूधारू पशु को खिलाने के लिए तो ठीक है, लेकिन टली हुई गाय को कैसे खिलाया जाए, सो पहले उसे भूखा मारते हैं, फिर गलियों में छोड़ देते हैं। ये कुछ कुछ उन नालायक संतानों की तरह है जो अपने मां बाप को भी बुढ़ापे में सड़ने के लिए छोड़ देते हैं।

राजस्‍थान में गंग नहर बनी तो उसके किनारे चारागाह विकसित होने लगे, बाद में इंदिरा गांधी नहर में उसे तब्‍दील कर दिया गया, नहर के किनारे सैकड़ो किलोमीटर तक नहर को ढहने से बचाने के लिए युक्लिप्टिस के पेड़ लगा दिए गए, लेकिन नहर के सीपेज से चारागाह विकसित नहीं किए गए, अगर नहर के किनारे चारागाह के लिए कुछ जमीन छोड़ते हुए चलते तो जितना पशु आज डेनमार्क में है, उससे अधिक पशु अकेले राजस्‍थान में हो सकता था, लेकिन जमीन के लालची लोगों और सरकार ने एक कतरा जमीन भी चारागाह के लिए नहीं छोड़ी।

बीकानेर में दो गोचर भूमि है, एक 27 हजार बीघा और एक 12 हजार बीघा। किसी जमाने में यह जमीन बियाबान का हिस्‍सा हुआ करती थी, आज यह शहर से सट गई है। जमीन के लालची लोगों ने सैकड़ों प्रयास किए कि किसी प्रकार यह जमीन वे हड़प कर लें और गोचर में घर बना लें, लेकिन कुछ लोगों की सजगता के कारण आज तक उनका सपना पूरा नहीं हो पाया है, लेकिन हर शहर इतना भाग्‍यशाली नहीं होता, राजस्‍थान की राजधानी जयपुर में हजारों एकड़ भूमि गोचर भूमि थी, शहर बढ़ता गया, बिल्‍डर बढ़ते गए और गोचर खत्‍म होते गए, आज वहां यह स्थिति है कि कहीं कही कोई गोचर का पैच है तो वहां माना जाता है आज नहीं तो कल जयपुर डवलपमेंट ऑथिरिटी वहां प्‍लॉट काट देगी।

जब अपनी मां के लिए जमीन ही नहीं छोड़ोगे तो उसे टलने के बाद कहीं तो जाना ही होगा, गलियों में निष्‍कासित करोगे तो गलियों में सड़ेगी और गोचर में हरी हरी चरने के लिए छोड़ोगे तो वहां हरी हरी चरेगी।

अगर टल गई है तो उसे मारकर चमड़ा ही निकाल लोगे, तो परिवार में और लोग भी है, उपभोगतावाद के चरम में उनका भी नम्‍बर लगेगा…

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प्रेमचंद आज

प्रेमचंद आज यदि कम्‍युनिज्‍म की आड़ लेकर ईदगाह लिखी होती तो वे लिखते…

1. देश का अधिकांश गरीब भूखा मर रहा है, उसके पास ट्रेड फेयर में खरीदने के लिए पैसा तक नहीं है। एक तरफ परधानजी नित नए कपड़े पहन रहे हैं और हामिद फटे कपड़े पहने घूम रहा है।

2. परधानजी एफडीआई की बात करते हैं, लेकिन देश का गरीब और गरीब होता जा रहा है और अमीर और अधिक अमीर, हामिद मुसलमान है, इसलिए उसके भाग्‍य में गरीब होना बदा गया है।

3. हामिद के पास ढंग का मोबाइल तक नहीं है, क्‍योंकि वह मुसलमान है।

4. दीपावली पर करोड़ो रुपए के पटाखे छोड़कर जहां अमीरी नग्‍न नृत्‍य कर रही है, वहीं हामिद की दादी अल्‍पसंख्‍यक होने के कारण चूल्‍हा तक नहीं जला पा रही। मोदीजी कहां है आपके सब्सिडी छोड़ने वाले??

5. बहुसंख्‍यक सवर्णों ने हमेशा दलितों पर अत्‍याचार किए हैं, हजारों साल से करते रहे हैं, छुआछूत करते हैं, इस कारण हामिद को चिमटा खरीदना पड़ रहा है, वरना पास के हिंदू टोले से अल्‍पसंख्‍यक हामिद की दादी चिमटा मांगकर भी काम चला सकती थी। इससे समुदाय भावना का विकास ही होता, लेकिन अलगाववाद के बीज ने भारत को नष्‍ट कर दिया है। दलितों का शोषण बंद करो मोदीजी…

6. हामिद का चिमटा कोई साधारण चिमटा नहीं है, यह दक्षिणपंथियों और राष्‍ट्रवादियों के मुंह पर तमाचा है।

7. चिमटा ही ऐसी चीज है जो हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक है, चाहे हामिद खरीदे या जॉन सभी की दादी चिमटे से अपने जलते हुए हाथ बचाना चाहती है, लेकिन मोदी सरकार पैलेट गन लेकर पीछे पड़ी है।

8. हामिद को चिमटे के बजाय चाकू खरीदना चाहिए था, क्‍योंकि साथी इतना समझ लो संघर्ष ही जीवन है और क्रांति से ही परिवर्तन होगा।

9. पूस की रात में दलित ठिठुरते हैं और अल्‍पसंख्‍यकों को अपना चिमटा मेले की मौज मस्‍ती के पैसों से खरीदना पड़ता है। इस देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था कहां है, हमें सामाजिक न्‍याय की जरूरत है, हर जरूरतमंद को चिमटा और रजाई सरकार मुफ्त में दे, हम ऐसी ही सरकार को वोट देंगे।

10. दलितों पर अत्‍याचार पर ही देश की नींव पड़ी है, अब इस सिस्‍टम को बदलने की जरूरत है, हामिद का चिमटा इस भ्रष्‍ट तंत्र की ईंट से ईंट बजा देगा।

11. अंग्रेजों ने पढ़ना लिखना सिखाया, मुगलों ने वाद्य यंत्र और शासन प्रणाली दी, लेकिन ब्राह्मणों ने हमेशा हमें लूटा और पीडि़त रखा, इस देश का कल्‍याण तभी हो सकता है, जब ब्राह्मणों का सफाया हो जाए और देश में जाति व्‍यवस्‍था समाप्‍त हो जाए।

12. देश को मंगलयान की नहीं रोटी की जरूरत है, सभी संसाधनों को देश की थोथी प्रगति के बजाय जुल्‍म से पीडि़त लोगों को रोटी देने में झोंकने की जरूरत है। न बांध, न पुल, न सड़कें हमें रोटी दे सकती है, रोटी हमें परचून की दुकान वाला बणिया देता है, लेकिन वह पूंजीवादी है, इसलिए उस पूंजीवादी की दुकान लूट लो और देश में समरसता कायम करो…